शतरंज के खिलाड़ी में सामंतवाद और रीतिकालीन साहित्य के अवसान का आभास

किसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी को गहराई से समझने के लिए, उसके देशकाल, वातावरण, और उद्देश्य से अवगत होना आवश्यक है।

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'देख भाई देख'- साहित्य, समाज और प्रामाणिकता

90 के दशक के हास्य धारावाहिकों में “देख भाई देख” की एक ख़ास जगह थी। इस लेख में प्रस्तुत है

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'अपने अपने अजनबी' और वैयक्तिक यथार्थबोध

मेहमान कलम: प्रस्तुत लेख अज्ञेय के उपन्यास ‘अपने अपने अजनबी’ के मूल्यांकन द्वारा हिन्दी साहित्य में वैयक्तिक यथार्थबोध के सिद्धांत

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धारावाहिक ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ (1988): यथार्थ, यथार्थवाद और संवेदना के बीच तालमेल ।

–सुमित चतुर्वेदी   भारतीय टेलिविज़न के मौजूदा स्वरूप को देखकर यह अंदाज़ा नही लगाया जा सकता है कि कभी धारावाहिकों

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