धारावाहिक ‘छोटी सी आशा’ में काव्य का दुर्लभ यथार्थवादी प्रयोग

मौजूदा हिन्दी धारावाहिकों में जहाँ कथावस्तु और कहानी में किसी प्रकार की नवीनता या रचनात्मकता की संभावना लगभग समाप्त कर दी गई है, एक समय ऐसा भी था जब हिन्दी धारावाहिकों में कहानी और कथावस्तु ही नहीं बल्कि प्रस्तुतीकरण और कथानक में भी प्रयोग किए जाते थे। ये प्रयोग इन पुराने धारावाहिकों के प्रसारण के समय शायद हमारे संज्ञान में नहीं आ पाते होंगे पर आज इन पर गौर करें तो पाएंगे कि इनमें कलात्मक, साहित्यिक और अन्य कई प्रकार की विशेषताएँ निहित होती थीं।

वर्ष 1999 में सोनी चैनल पर प्रसारित हुआ ‘छोटी सी आशा’ एक ऐसा धारावाहिक था जिसमें कहानी आम हिन्दी धारावाहिकों से अलग तो थी ही पर प्रस्तुतीकरण में भी कुछ नए प्रयोग शामिल थे। तमिल फिल्मों के प्रमुख निर्देशक के बालाचन्दर जिन्होंने हिन्दी सिनेमा में भी ‘एक दूजे के लिए’ जैसी सफल फिल्म बनाई थी, ने इस धारावाहिक का निर्देशन किया था। यह धारावाहिक उन्हीं के एक तमिल धारावाहिक ‘कई अलावु मानसु’ का हिन्दी रूपान्तरण था। धारावाहिक की कहानी एक ऐसी महिला पर केन्द्रित थी जिसके पति के एक दुर्घटना में मर जाने के बाद, आर्थिक कठिनाइयों के कारण अपने बच्चों से हमेशा के लिए दूर होकर दूसरे परिवारों में रहने के लिए भेजना पड़ता है। आगे जीवन में कई उतार-चढ़ाव आने पर जब अपने बड़े हो चुके बच्चों के बारे में उसे पता चलता है तो वह उन्हें ढूँढने और अज्ञात रहकर उनसे मिलने का प्रयास करती है।



धारावाहिक की मुख्य कहानी बेहद संवेदनशील और भावुक करने वाली तो थी ही पर इसके अलावा इस कार्यक्रम में एक अन्य कहानी भी थी जिसमें कुछ सहायक कलाकार शामिल थे। यह कहानी थी त्रिपाठी मास्टर और उनकी पत्नी बागेश्वरी की जिनका बेटा जो सेना में एक अफसर है, युद्ध में मारा जाता है। इसकी खबर त्रिपाठी को हो जाती है पर इस बात को वह अपनी पत्नी से, उन्हें सदमा लगने के डर से, छिपाते हैं। त्रिपाठी के इस किरदार को निभाया है प्रख्यात हिन्दी कवि और साहित्यकार अशोक चक्रधर ने। आम तौर पर चक्रधर को आप संजीदा किरदारों में नहीं देखेंगे पर इस धारावाहिक में उन्होंने एक दुखी पिता और साथ ही एक आशु-कवि की भूमिका निभाई है जो अलग-अलग मौकों पर परिस्थितिनुसार कविता के माध्यम से अपनी भावनाएँ व्यक्त करता है।

इस धारावाहिक के लिए लिखी गईं सभी कविता चक्रधर ने अपने काव्य संग्रह ‘जाने क्या टपके’ में शामिल की हैं। इस संग्रह की भूमिका में वह धारावाहिक से जुड़े अपने अनुभवों और इसके लिए लिखी अपनी कविताओं के बारे में लिखते हैं- “धारावाहिक ‘छोटी सी आशा’ पहले तमिल भाषा में बन चुका था। श्री के बालाचन्दर भावनाओं का उद्रेक पहचानते हैं।… मूल कविताएँ तमिल के यशस्वी गीतकार वाली ने लिखी थीं। उन कविताओं ने प्रस्थान-बिन्दु का कार्य किया और परिणाम में प्राप्त हुईं प्रस्तुत कविताएं। इनमें कहीं वाली की कविताओं का भावानुवाद है तो कहीं उत्तर-भारतीय दर्शक की मानसिकता और भाषा-संस्कार के अनुरूप नवीन उद्भावनाएं हैं।“

जैसा कि चक्रधर लिखते हैं इन कविताओं में कुछ वाली की कविताओं का भावुकता-पूर्ण अनुवाद है और कुछ उत्तर भारतीय मानसिकता का समावेश। ये कविताएं कहीं प्रेम और अनुराग पर आधारित वैयक्तिक संवेदनाओं की खट्टी-मीठी अभिव्यक्ति करती हैं तो कहीं राजनीतिक विषयों पर कटाक्ष और व्यंग्य। त्रिपाठी के बेटे के युद्ध में भाग लेने और वीरगति को प्राप्त होने को लेकर लिखी गईं कविताओं में कहीं सैन्य कर्तव्य के और कहीं अत्यंत भावुक करने वाले पुत्र से हमेशा के लिए विछोह का दुख प्रस्तुत होता है। एक कविता जो अत्यंत संवेदनात्मक है वह है ‘बेटे की बरसी’। इस कविता में ‘बरसी’ शब्द का संज्ञा और क्रिया के रूप में कविता में प्रयोग यमक अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत है कविता का प्रारंभिक अंश-

“आज बरसी है।

(बागेश्वरी – ‘क्या?’)

आज बरसी है।

इस गगन की

आंख बरसी है।

 

साल भर तक मेघ

तेरी याद में

हर पल विकल

इस हृदय की धरती

मिलन के लिए तरसी है।

आज बरसी है।”

यह तो बात हुई काव्य की विशेषताओं की। इसके बारे में अधिक और बेहतर विश्लेषण कोई साहित्यिक आलोचक ही कर सकता है। पर इस धारावाहिक में काव्य का हुआ प्रयोग प्रस्तुतीकरण और कथानक के मद्देनज़र इसे अन्य सभी धारावाहिकों से अलग बनाता है। ऐसा नहीं है कि धारावाहिकों में काव्य का प्रयोग कभी नहीं हुआ। इससे पहले वर्ष 1988 में बने धारावाहिक मिर्ज़ा गालिब में गुलज़ार ने गालिब की शायरी को गीतों के माध्यम से कहानी में पिरोया था। पर ‘छोटी सी आशा’ में हुआ काव्य का उपयोग कई मायनों में अलग है। धारावहिक में कविता कहने वाला व्यक्ति यानी त्रिपाठी का किरदार उस दृश्य में ही अन्य पात्रों के मध्य उपस्थित रहता है और कविताएँ यथार्थ में ही रहकर उसके संवादों का रूप लेती हैं। मिर्ज़ा गालिब या अन्य फिल्मों की तरह कविताएं कहने या गाने वाला एकांकी संवाद नहीं कर रहा होता है और ना ही किसी महफिल या गोष्ठी में इसे श्रोताओं के सामने पेश कर रहा होता है। आशु कविताएँ होने के कारण यह कविताएँ और इनका पाठ उसी क्षण की परिस्थिति में उपजते हैं और दृश्य का मौलिक हिस्सा होते हैं।

इस प्रकार कविताओं का उपयोग ना केवल कहानी में होता है बल्कि कथानक में भी और फिर भी कहानी और उसके प्रस्तुतीकरण में यथार्थवाद का सिद्धांत बना रहता है। खास बात है कि जहाँ धारावाहिक में प्रयुक्त कुछ कविताएं सामाजिक या राजनीतिक कटाक्ष पर आधारित हैं और कुछ प्रेम पर आधारित कविताएं हैं जिनका प्रयोग सहजता से किसी भी परिस्थिति में किया जा सकता है, वहीं त्रिपाठी के बेटे के युद्ध में मारे जाने और उनके इस बात को अपनी पत्नी से छिपाने के कारण चल रहे उनके अंतर्द्वंद की परिस्थितियाँ कहानी में बिल्कुल मौलिक और अद्वितीय हैं जिन पर लिखी कविताओं को कहानी में पिरोना एक कठिन कार्य है। इस कार्य को धारावाहिक की कहानी में दृश्यों की कल्पना के माध्यम से सिद्ध कर पाना बालाचंदर की सफलता मानी जाएगी। जैसा की ऊपर दी गई कविता का उदाहरण दिखाता है बेटे की बरसी के दिन बारिश के संयोग को दिखाकर त्रिपाठी के लिए अपने भावातिरेक को दर्शाना और फिर भी अपनी पत्नी से बात को छिपाए रखना दृश्य कल्पना का उत्तम उदाहरण है।

पर इस कार्य में अशोक चक्रधर की अभिनय क्षमता का भी अहम स्थान है। एक क्लिष्ट परिस्थिति पर भावुकता के साथ कविता के माध्यम से अपने मनोभावों को प्रकट करना पर साथ ही कहानी की तरलता और दृश्य की गतिशीलता को बनाए रखना चक्रधर के सधे हुए अभिनय के कारण ही संभव हो सका। हिन्दी धारावाहिकों में समय के साथ एकरूपता और वैचारिक दिवालियेपन ने अपनी जगह मजबूती से बना ली है। ऐसे में काव्य के धारावाहिक में इस प्रकार के अनूठे प्रयोग पर प्रकाश डालना इस धारावाहिक की विशेषता को उजागर करने के लिए आवश्यक तो है ही बल्कि धारावाहिकों पुन: उचित मानक प्रदान करने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

 

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