हिन्दी धारावाहिकों पर आलोचनात्मक पत्रकारिता का अभाव

दोपहर के एक या दो बजे के समय अगर आप कोई भी जाना-माना हिन्दी समाचार चैनल (एक दो को छोड़कर)

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धारावाहिक ‘छोटी सी आशा’ में काव्य का दुर्लभ यथार्थवादी प्रयोग

मौजूदा हिन्दी धारावाहिकों में जहाँ कथावस्तु और कहानी में किसी प्रकार की नवीनता या रचनात्मकता की संभावना लगभग समाप्त कर

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धारावाहिक ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ (1988): यथार्थ, यथार्थवाद और संवेदना के बीच तालमेल ।

  भारतीय टेलिविज़न के मौजूदा स्वरूप को देखकर यह अंदाज़ा नही लगाया जा सकता है कि कभी धारावाहिकों और टीवी

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कहानी ‘धारावाहिकों’ की।

प्रस्तावना: धारावाहिक दूरसंचार का एक महत्वपूर्ण और संभावनाओं से भरा माध्यम है पर एक गहन शोध और विचार के बिना

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