स्त्री के अस्तित्व को ढूँढती मैत्रेयी पुष्पा की पुस्तक ‘खुली खिड़कियां’

खुली खिड़कियां से एक अध्याय

आधुनिक हिन्दी साहित्यकारों में मैत्रेयी पुष्पा का एक अहम स्थान है। पर यह स्थान उन्होंने सुगम, सरल और लोकलुभावन साहित्य लिखकर नहीं बनाया है, बल्कि समाज की हकीकत को, कई परतें उधेड़ कर, सबके सामने प्रस्तुत कर बनाया है। यह काम आसान नहीं है क्योंकि नवउदारवाद के इस समय में शायद ही कोई हकीकत से सामना करना चाहता है। पर मैत्रेयी ने उन विषयों को उस रूप में अपने साहित्य में प्रस्तुत किया है जिनसे आम तौर पर, खास कर शहरी वर्ग के पाठक अपने आप को दूर पाते हैं या फिर दूर रहने की कोशिश करते हैं।

मैत्रेयी की सोच, विचार और विचारधारा उनके साहित्य में साफ परिलक्षित होती है। पर साहित्य में पात्र और कहानी अधिक महत्वपूर्ण होते हैं और किसी भी प्रकार का विमर्श उस कहानी की व्याख्या से ही पूर्ण रूप से बाहर निकलकर आता है। ऐसे में मैत्रेयी द्वारा लिखित सामाजिक विमर्श की कृति को पढ़ना उनके सामाजिक और राजनीतिक विचारों को स्पष्ट रूप से समझने और जानने के लिए एक खास अवसर प्रदान करता है। ऐसी ही एक पुस्तक है ‘खुली खिड़कियां’।

सबसे पहले वर्ष 2003 में प्रकाशित यह किताब भारत की आज़ादी के 50 वर्ष यानि अर्धशताबदी पूरे होने के संदर्भ में देश में स्त्रियों की स्थिति के इतिहास, वर्तमान एवं भविष्य को लेकर लिखी गई थी। सामयिक प्रकाशन द्वारा इसका पाँचवाँ संस्करण 2016 में प्रकाशित हुआ। पुस्तक की शुरुआत में मैत्रेयी लिखती हैं-

“यह किताब रणभेरी गुंजाती ऐसी अस्मिताओं के नाम, जिन्होंने अपनी अंतश्चेतना के झरोखों से उन औरतों की तकलीफें देखी हैं, जो पितृसत्ता के किले आज भी बंद हैं। कहने के लिए देश की आजादी की अर्द्धशती मनाकर हम इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर गए हैं!”

स्त्री विमर्श पर आधारित यह किताब मानवीकी विषयों में प्रयुक्त ‘इंटरसेक्शनेलिटी’ यानि अन्तरानुभागीयता के सिद्धांत को वास्तविक जीवन के उदाहरणों और विषयों के माध्यम से स्थापित करती है। अन्तरानुभागीयता का सिद्धांत एक ही मनुष्य पर अलग-अलग प्रकार के सामाजिक एवं राजनैतिक उपेक्षा, शोषण आदि के अनुभवों की व्याख्या करता है। यानि एक स्त्री होने के नाते हो रही उपेक्षा या फिर शोषण के साथ ही उस स्त्री के दलित या गरीब या अल्पसंख्यक होने के कारण होने वाली उपेक्षा या शोषण की व्याख्या को अन्तरानुभागीय अध्ययन कहा जा सकता है। मैत्रेयी ने कई सारे अध्यायों में स्त्रियों पर स्त्री होने के अलावा दूसरी सामाजिक-राजनीतिक पहचानों के चलते होने वाले प्रभावों का उल्लेख किया है।

इस पुस्तक को छ: भागों में बाँटा गया है। ये भाग उन विषयों पर आधारित हैं जो मनुष्य के सम्पूर्ण अस्तित्व को प्रभावित करते हैं यानि- ‘धर्म’, ‘संस्कृति’, ‘समाज’, ‘साहित्य’, ‘राजनीति’ और आज के समय के परिप्रेक्ष्य में ‘फिल्म और टेलीविजन’। इन सभी भागों में मैत्रेयी ने स्त्री की स्थिति को इन विषयों के अनुसार उजागर किया है।

कुल मिलाकर इस पुरी कृति में मैत्रेयी स्त्री को लेकर एक बुनियादी मुद्दा उठा रही हैं। यह मुद्दा वही है जो जॉन स्टूअर्ट मिल ने अपनी 19वीं सदी की किताब ‘सब्जेक्शन ऑफ़ विमेन’ में और सिमोन दी बुवीये ने अपनी 20वीं सदी की किताब ‘द सेकन्ड सेक्स’ में पूछा था। यह मुद्दा है स्त्री की स्वायत्ता और उसके अस्तित्व के रूप-निर्धारण का।

मिल ने कहा है कि हम स्त्री के असली स्वरूप को जान नहीं सकते क्योंकि हमने स्त्री को अपनी तरह से स्वायत्त कभी रहने ही नहीं दिया। उसी तरह सिमोन का भी यह तर्क बेहद लोकप्रिय रहा है कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है। मैत्रेयी भी उसी प्रकार अपने विभिन्न लेखों में यही तर्क दे रही हैं कि स्त्री का अपनी स्थिति पर बहुत कम नियंत्रण होता है। उसके नाम से लेकर, उसके जीवन, उसके भविष्य और अस्तित्व के निर्धारण में उसके खुद के मत और निर्णय के महत्व को समाज, धर्म, संस्कृति, बाज़ार, राजनीति आदि द्वारा निरन्तर कम किया जाता रहता है। पर मिल और सिमोन की तरह वह यह तर्क दार्शनिक या मनोविश्लेषणवादी रूप में नहीं देती हैं। मैत्रेयी इन मुद्दों को अमूर्त सिद्धांतों के बजाय असल उदाहरणों के माध्यम से पाठकों के सामने प्रस्तुत करती हैं फिर चाहे ये उदाहरण ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में हों, वास्तविक वर्तमान में या फिर पौराणिक कहानियों में।



वास्तविक उदाहरणों के कारण यह पुस्तक और ग्राह्य तो बनती ही है पर साथ ही मैत्रेयी इन उदाहरणों के माध्यम से अन्तरानुभागीय विश्लेषण को आकार दे पाती हैं। विभिन्न लेखों में मैत्रेयी ने स्त्रियों की परेशानियों को उभारा तो है ही पर साथ ही यह भी बताया है कि कैसे जाति, धर्म, वर्ग आदि के कारण उनकी ये परेशानियाँ और भी बढ़ जाती हैं। मुख्यधारा के साथ ही वैकल्पिक नारीवादी परिचर्चा में इस प्रकार का विश्लेषण सहज उपलब्ध नहीं हो पाता है।

इस पुस्तक में मैत्रेयी कहीं विशिष्ट आदिवासी समूहों की महिलाओं की बात करती हैं तो कहीं शहरी घरेलू कामगार महिलाओं की। कहीं वह अनुसूचित जाति की महिलाओं का ज़िक्र करती हैं तो कहीं अल्पसंख्यक महिलाओं के बारे में बात करती हैं। पुरुषों की सत्ता को तो वह ललकारती ही हैं पर संपन्न वर्ग की महिलाओं द्वारा अन्य महिलाओं के साथ किए जा रहे शोषण और भेदभाव का भी पर्दाफाश करना मैत्रेयी की मंशा रहती है। इस कार्य में मैत्रेयी किसी भी विषय को छूने से गुर्रेज़ नहीं करती हैं फिर चाहे वह सांप्रदायिक दंगों का मुद्दा हो या फिर जातीय उत्पीड़न और हिंसा का।

साथ ही मैत्रेयी घरेलू दुनिया में भी स्त्री की स्थिति को उसी प्रकार उजागर करती हैं जैसे बाहरी दुनिया में। किन प्रकार के प्रलोभनों और बंधनों द्वारा महिलाओं को घरेलू जीवन में कैद कर उन्हें निर्भर प्राणी बनाया जाता है उसकी विवेचना भी इस पुस्तक में प्रमुखता से मौजूद है। जहाँ प्रलोभनों का ज़िक्र स्त्री के साथ बौद्धिक स्तर पर किए गए छल की व्याख्या करता है वहीं बंधनों की बात हिंसा पर प्रकाश डालती है। पर मैत्रेयी इस हिंसा की तहों तक पहुंचना चाहती हैं। एक प्रकार से यह पूरी कृति स्त्रियों के साथ होने वाली हिंसा के इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति, संस्कृति और अर्थशास्त्र का ब्यौरा देती है। एक तर्क जो कई अध्यायों में बार-बार स्पष्ट होता है वह यह है कि स्त्री की अपने अस्तित्व को साकार करने के हर प्रयास को रोकने के लिए पुरुष समाज ने जिस हथियार को तैयार किया है वह है उसके साथ घटने वाली हिंसा और उस हिंसा का डर। यानी जितना नुकसान स्त्री के अस्तित्व को हिंसा से होता है उतना या उससे अधिक नुकसान उसके डर से होता है। उस डर के कारण वह कई ऐसे सामाजिक बंधनों में बंध जाती है और कई ऐसे समझौते करती जाती है जिनके कारण वह कभी अपनी मानुषिक नियति को पा नहीं पाती।

पर मैत्रेयी के साहित्य को जिन्होंने पढ़ा है वह जानते होंगे कि वह कभी पराजयवादी दृष्टिकोंण नहीं रखती हैं। यह पुस्तक भी अपवाद नहीं है। उनके लेखों की हर महिला बंधनों से कहीं जूझ रही है, कहीं लड़ रही है और कहीं उन्हें तोड़ रही है। और इस सब से भी ऊपर वह समाज को और विशेषकर स्त्री समाज को चेतावनी दे रही है बंधनों से आगाह रहने की और उन्हें तोड़ने के लिए प्रेरणा भी दे रही हैं।

-सुमित चतुर्वेदी

 

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