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जयशंकर प्रसाद के गद्य साहित्य में पद्य और काव्यत्मकता की छाया

Source: Vani Prakashan

जय शंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के एक मूर्धन्य साहित्यकार हैं जिन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक तथा निबन्ध सभी विधाओं में रचना की है। छायावादी युग के प्रमुख स्तम्भकारों जैसे पन्त, निराला तथा महादेवी वर्मा के मध्य उनका भी प्रमुख स्थान है। जय शंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1890 बनारस में हुआ और 15 नवम्बर 1930 में, 47 साल की अल्पायु में ही निधन हो गया। इतनी अल्पावधि में भी प्रसाद ने अपनी प्रतिभा से हिन्दी के साहित्याकाश को आलोकित कर दिया।

उनकी कविता, कहानी, नाटक तथा उपन्यासों, सभी में, उनकी काव्यात्मक उत्कृष्टता के साथ प्रकृति से उनका प्रेम परिलक्षित होता है, जिनमें वेदना, उदासी, अनतर्द्वन्द, स्वानुभूति आदि का समावेश होता है। इस समय अनायास ही प्रसाद की लेखनी काव्यात्मक रूप लेकर प्रातःकाल और सन्ध्या की किरणों, सूरज, चन्द्रमा, नदी की कलकल, आकाश आदि में इन सभी भावों को सचित्र व्यक्त कर देती है। प्रसाद के नाटक, कहानी, उपन्यास और कविताओं में अनेक मनोगत भावनाओं के दर्शन होते हैं।



प्रसाद ने विभन्न विधाओं में रचना की है। जिन पर दृष्टिपात कर उनकी साहित्यिक विशेषताओं को समझा जा सकता है। ऐतिहासिक पृष्ठ्भूमि पर आधारित उनके नाटकों में भारतीय इतिहास तथा संस्कृति से उनका लगाव परिलक्षित होता है।  उनके नाटकों में राष्ट्रप्रेम की भावना के साथ सांस्कृतिक चेतना निहित रहती है। कवि हृदय होने के कारण उनके नाटकों में अनेक गीतों का भी समावेश होता है जिनमें राष्ट्रप्रेम के साथ पात्रों की वैयक्तिक अनुभूति का मनोवैज्ञानिक रूप दृष्टिगत होता है जिसमें पात्रों का अन्तर्द्वन्द सूक्ष्मता  से अभिव्यक्त होता है।

प्रसाद के नाटक दृश्यों और पात्रों की अधिकता के साथ विस्तीर्ण फ़लक लिए होते हैं। दृश्यों का विस्तीर्ण रूप, गीतों  की अधिकता, शुद्ध सहित्यिक, तत्सम शब्दावली के कारण उनके नाटकों को रंगमंच पर अभिनीत करना कठिन माना जाता है। परन्तु  गीतों का सौन्दर्य अनुपम होता है,जैसा कि स्कन्दगुप्त के इस अंश में देखा जा सकता है,

‘आह वेदना मिली विदाई!

मैंने भ्रम-वश जीवन-संचित,

मधुकरियों की भीख लुटाई।

छलछल थे आँसू  के श्रमकण,

आँसू- से गिरते थे प्रतिक्षण।

मेरी यात्रा पर लेती थी-

नीरवता अनंत अंगड़ाई।’

आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने कहा है, ‘ प्रसाद जी के नाटकों में चरित्र- चित्रण प्रधान होने के कारण, उनके अंगभूत मनोवैज्ञानिक पक्ष का सुन्दर निरूपण हुआ है।’

उपन्यास विधा में भी उनकी काव्यमय भाषा, उनके प्रकृति प्रेम को प्रदर्शित करती हुई प्रस्तुत होती है। गद्य की भाषा में अनेक स्थान पर पद्यमयी भाषा का समावेश होकर प्रकृति की चित्रात्मक रूप में अभिव्यक्ति मिलती है जो उनके काव्य का नैसर्गिक सौन्दर्य है।

उदाहरणस्वरूप- ‘निशीथ के नक्षत्र गंगा के मुकुल में अपना प्रतिबिम्ब देख रहे थे। शान्त पवन का झोंका सबको आलिंगन करता हुआ विरक्त के समान भाग रहा था’, तथा ‘ जूही की प्यालियों में मकरन्द- मदिरा पीकर मधुप की टोलियाँ लड़खड़ा रही थीं और दक्षिण पवन मौलसिरी के फूलों की कौड़ियाँ फैंक रहा था। कमर से झुकी हुई अलबेली बेलियाँ नाच रही थीं। मन की हार जीत हो रही थी।’

उपन्यासों में उनकी काव्यप्रियता के साथ नाटक शैली की छाप दिखाई देती है। घटनाएं विभिन्न स्थलों पर तथा व्यापक परिवेश में घटित होती हैं। पात्रों की अधिकता के  साथ ही आरम्भ से अंत तक बिछुड़े हुए पात्रों का  नाटकीयता से मिलन  हो जाता है।

प्रसाद ने अपने  चर्चित उपन्यास ‘कंकाल’ में समाज में धर्म के नाम पर व्याप्त  आडम्बर , सामाजिक भेदभाव, छूआछूत आदि सामाजिक बुराईयों पर कटाक्ष किया है। उनके मन में समाज के प्रति जागरूकता दिखाई देती है। कंकाल में  प्रारम्भ का ही प्रसंग है, जिसमें उन्होंने अत्यंत तीखा कटाक्ष किया है- ‘माघ की अमावस्या की गोधूली में प्रयाग में बाँध पर प्रभात का सा जनरव और कोलाहल तथा धर्म लूटने की धूम काम हो गई है; परन्तु बहुत-से घायल और कुचले हुए अर्धमृतकों की आर्तध्वनि उस पावन प्रदेश को आशीर्वाद दे रही है।’

देश में धर्म के नाम पर होने वाले अधर्म से, प्रसाद के मन में होने वाली वेदना और रोष  प्रस्तुत अंश में प्रकट होता है- ‘क्या और भी किसी देश में इसी प्रकार का धर्म संचय होता है जिन्हें आवश्यकता नहीं, उनको बिठाकर आदर से भोजन कराया जाये, केवल इस आशा से कि परलोक में वे पुण्य-संचय का प्रमाण – पत्र देंगे, साक्षी देंगे और इन्हें, जिन्हें पेट ने सता रखा है, जिनको भूख ने अधमरा बना दिया है, जिनकी आवश्यकता नंगी होकर  वीभत्स नृत्य कर रही है-वे मनुष्य कुत्तों के साथ जूठी पत्तलों के लिये लड़ें, यही तो तुम्हारे धर्म का उदाहरण है!’

रमेश चंद्र शाह ने ‘समकालीन रचना में स्वतंत्रता का अर्थ’ नामक निबंध में प्रसाद के विषय में लिखा है कि ‘उनके भीतर कहीं न कहीं गहरा विक्षोभ और विद्रोह – भाव था-अराजकता की परिणीति तक ले जाने वाला विक्षोभ-भाव जिसे कंकाल में उन्होंने प्रत्यक्ष किया’।

पात्रों के मन का द्वन्द या व्यथा व्यक्त करते  समय उनकी भाषा – शैली काव्यात्मक एवं संस्कृत निष्ठ रूप ले लेती है।  उदाहरण स्वरूप कहीं उनके उपन्यास की नायिका का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि ‘उसका भूत, वर्तमान और भविष्य – तीनों अंधकार में कभी छिपते और कभी तारों के रूप में चमक उठते’ तो कहीं वह अपने पात्र की मनोस्थिति और पवन और नदी के प्रवाह की उपमा कुछ इस प्रकार करते हैं- ‘गाला चुपचाप सुनहली किरणों को खारी के जल में बुझती हुई देख रही थी……उस निर्जन स्थान में पवन रुक-रुक कर बह रहा था। खारी बहुत धीरे-धीरे अपने करुण प्रवाह में बहती जाती थी, पर जैसे उसका जल स्थिर हो-कहीं से आता-जाता न हो’। मन के अन्तर्द्वन्द को व्यक्त करती हुई काव्यमयी भाषा  मन्द- मन्द हवा के सदृश प्रवाहमान सी प्रतीत होती है।

जय शंकर प्रसाद ने अपने निबन्ध ‘यथार्थवाद और छायावाद’  में छायावाद जिसे रहस्यवाद भी कहा जाता है, का उल्लेख करते हुए लिखा है ‘कविता के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देश-विदेश की सुन्दरी के बाह्य वर्णन से भिन्न जब वेदना के आधार पर स्वानुभूति अभिव्यक्त होने लगी, तब उसे छायावाद के नाम से अभिहित किया गया’।  साथ ही प्रसाद का कहना है, ‘छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है’। प्रसाद की रचनाओं में उनके इन्हीं विचारों की अभिव्यक्ति है।

निःसंदेह प्रसाद का एक कवि हृदय है। काव्य में उनकी लेखनी  प्रकृति में निमग्न  होकर तत्परता और सुरम्यता से एकाकार हो जाती है। शुद्ध संस्कृत निष्ठ शब्दावली  उनके काव्य सौंदर्य की विशेषता है। कविता से उनका लगाव उनके उपन्यास तथा नाटकों में भी दृष्टिगोचर होता है।  उपन्यास तथा कहानियों में उनका समाज की कुरीतियों के प्रति विद्रोह और विक्षोभ समाहित होता है। उनके साहित्य में पात्रों का अंतर्मन सूक्ष्मता से अभिव्यक्त होता है जिसमें उनकी छायावादी शैली और काव्यात्मकता से उनका लगाव एक अहम भूमिका निभाता है।

अमिता चतुर्वेदी एक स्वतंत्र लेखिका हैं और अपना परिचय नामक ब्लॉग पर लिखती हैं।

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