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Film Appreciation Club (New)


As said earlier Opinion Tandoor film club will try to pick up threads from previous screenings and weave stories of our club as well. So picking up from the first screening the film club has picked its second movie to be ‘Shatranj Ke Khiladi’. Directed by Satyajit Ray this movie is similar to Angoor in that, both are adaptations from works of two of the classic writers in Hindi and English literature respectively. While Angoor was based on Shakespeare’s Comedy of Errors, Shatranj ke Khiladi is based on the story by the same name written by Premchand. The two movies are also similar in their aesthetic as both Gulzar and Satyajit Ray were considered as those relying on realism. Sanjeev Kumar starred in both films with his naturalistic comedic timing lending humour to both films.
But the similarities stop there. While Angoor was a classic comedy with a middle class family falling into confusion and chaos and the story resolving within the family itself, Shatranj ke Khiladi is satirical in nature which comments upon society affected by Indian feudalism in pre-British era. Thus the historical setting of the films are also quite different. Apart from the plot and story, we can also attempt to look at Satyajit Ray’s craft of filmmaking while looking at this film.
So come join us for the second screening of Opinion Tandoor film appreciation club on 22nd July 2018 at 10:30 am and let’s take our discussion from last time on films and literature, and cinema and realism further but also picking up new topics and threads to weave our film club story ahead.
Please confirm your participation through the Facebook page for the event or by sending a message at opinion.tandoor@gmail.com. You can also send a message on the Facebook or Instagram page of Opinion Tandoor. 

ओपिनियन तंदूर अपने फ़िल्म क्लब में दिखाई जाने वाली फिल्मों के माध्यम से अपनी एक कहानी बुनने की कोशिश करेगा ये तो आप जानते ही हैं। इसलिए अपनी पहली स्क्रीनिंग में हुई चर्चाओं से कुछ बातों को उठाते हुए हमारी दूसरी फिल्म स्क्रीनिंग का चुनाव हैशतरंज के खिलाड़ी सत्यजीत रे द्वारा निर्देशित यह फिल्म हमारी पहली फिल्म अंगूर से जिस बात में समान है, वह यह कि दोनों फिल्में हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य के दो दिग्गज साहित्यकारों प्रेमचंद और शेक्सपियर की कृतियों पर आधारित हैं, अंगूर शेक्सपियर के नाटककॉमेडी ऑफ़ एरर्सपर और शतरंज के खिलाड़ी इसी नाम की लघु-कथा पर। साथ ही दोनों फिल्में हिन्दी सिनेमा के यथार्थवादी दौर से प्रेरित फिल्में हैं, जैसा कि इनके निर्देशकों गुलज़ार और सत्यजीत रे को भी इस दौर से प्रभावित माना जाता है। दोनों में ही संजीव कुमार की मुख्य भूमिका है जिसमें अपने नैसर्गिक हास्य अभिनय से वह फिल्म में हास्य रंग का संचार करते हैं।
पर इसके अतिरिक्त दोनों फिल्मों में और समानताएँ नहीं हैं। अंगूर एक विशुद्ध हास्य प्रधान फिल्म थी जिसमें एक मध्यम वर्गीय परिवार के बीच उथल-पुथल और गड़बड़ियों से हास्य उपजता है, वहीं शतरंज के खिलाड़ी एक व्यंग्यात्मक फिल्म है जो भारत के ब्रिटिश-शासन-पूर्व सामंतवाद पर टिप्पणी करती है। इसीलिए दोनों फिल्मों के समयकाल भी एक दूसरे से भिन्न हैं। साथ ही इस फिल्म के माध्यम से हम सत्यजीत रे की फिल्म बनाने की कला पर भी गौर कर सकते हैं।
तो आइए ओपिनियन तंदूर फिल्म क्लब के दूसरे अध्याय में 22 जुलाई 2018 को सुबह 10:30 बजे और हमारे पिछली स्क्रीनिंग में उठी फिल्म और साहित्य, और सिनेमा और यथार्थवाद की चर्चा को आगे बढ़ाएँ और साथ ही कई नए मुद्दों पर भी बात करें और अपने फिल्म क्लब के सफर और आगे ले चलें।
कृपया अपने शामिल होने की पुष्टि इस ईवेंट के पेज पर सुनिश्चित करें अन्यथा opinion.tandoor@gmail.com पर अपने आने की सूचना भेजें। आप अपना संदेश ओपिनियन तंदूर के फेसबुक या इंस्टाग्राम के इनबॉक्स में भी भेज सकते हैं।

From Previous Screenings


Thus completed our first screening of Opinion Tandoor Film Appreciation club. To watch a classic comedy like Angoor is never tiring but to watch it with some people who have never seen it is even more refreshing as you get to enjoy it again whilst they are enjoying it the first time and remarkably laugh at all those places yet again where they laugh. Discussed about Comedies, Middle Class Cinema, 80s Cinema Gulzar's direction, Cinematic Techniques, Mis-en-scene and Shakespeare among many other things. Couldn't have had a better beginning to the club. Hope to see those who missed joining us this time around, next time. Will take forward one of the many threads that we picked up today and weave our own film club stories.
और ऐसे पूरा हुआ फ़िल्म क्लब का हमारा पहला अध्याय। 'अंगूर' जैसी सदाबहार कॉमेडी को देखना वैसे ही एक मज़ेदार अनुभव होता है पर ऐसे लोगों के साथ इस फिल्म को देखना और भी खास हो जाता है जिन्होंने यह फिल्म कभी ना देखी हो खासकर तब जब आप देखते हैं कि आप उन्हीं पलों पर ठहाके लगा रहे हैं जहाँ इस फिल्म को पहली बार देखने वाले दर्शक हँस रहे हैं। हमने गुलज़ार की बातें की, मध्यम वर्गीय सिनेमा की, सिनेमा की तकनीक की, कॉमेडी की और शेक्सपियर की भी। क्लब की इससे अच्छी शुरुआत नहीं हो सकती थी शायद। आशा है जो इस बार नहीं आ पाए वो अगली बार हमारे साथ जुड़ेंगे। आज कई धागों के सिरे उठाए उन्हीं में से कोई एक सिरा फिर आगे उठाएँगे और अपने फिल्म क्लब की और कहानियाँ बुनेंगे।



The aim of this club is watch films together but not just for entertainment but also to appreciate them in new and interesting ways. Films can be understood in great depth both in terms of their plots and storylines as well as their techniques and making. A discussion on any film can go in multiple directions and our aim is to travel together on this journey and enrich ourselves with different perspectives.

इस क्लब का उद्देश्य है फ़िल्मों के शौकीन लोगों को एक जगह इकट्ठा कर फिल्में देखना पर सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि उन्हें और बेहतर और नए-नए तरीकों से समझने और सराहने के लिए। फिल्मों को ना सिर्फ उनकी कहानियों और कथा-वस्तु के परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है बल्कि उनकी तकनीक और बनाने के तरीकों के मद्देनज़र भी समझा जा सकता है। किसी भी फिल्म पर चलने वाली कोई भी चर्चा अनेक दिशाओं में बढ़ती जा सकती है और हमारा उद्देश्य है इस सफर पर एक साथ चलने का और एक दूसरे के दृष्टिकोण से अपनी समझ को और बेहतर करने का। 

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With little bits of hi…