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साहित्य, सिनेमा और अनुरूपण: शेक्सपियर के 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' पर आधारित गुलज़ार द्वारा निर्देशित 'अंगूर'


हिंदी सिनेमा का साहित्य से रिश्ता बहुत गहरा तो नही है पर  शेक्सपियर की कहानियों को हिंदी निर्देशकों ने बहुत आज़माया है। हालांकि इनमें से अधिकाँश निर्देशकों ने उनके गंभीर नाटकों को चुना है। गुलज़ार ने शेक्सपियर के हास्य नाटक 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' को एक आधुनिक मध्यमवर्गीय सन्दर्भ में अनुरूपण कर 'अंगूर' (१९८२) के रूप में ढाला। किसी प्रसिद्ध नाटककार की लोकप्रिय रचना के संवादों और पटकथा को अनुरूपण में हावी ना होने देना और पर अपने अंदाज़ को कायम रखना एक बेहद कठिन काम है।

गुलज़ार शब्दों के जादूगर तो हैं ही। इसीलिए फ़िल्म में अधिकाँश हास्य पात्रों के मज़ाकिया और चतुराई लिए हुए संवादों से उपजा है। पर इस काम को मँझे हुए कलाकार जैसे कि संजीव कुमार, देवेन वर्मा, मौसमी चटर्जी, दीप्ती नवल और अरुणा ईरानी के द्वारा ही पूरा किया गया है। इस हास्य फ़िल्म की ख़ास बात है कि इसमें शारीरीक हास्य यानी फिसिकल कॉमेडी का बहुत कम और सधा हुआ प्रयोग किया गया है। साथ ही कॉमेडी के बहुत समय से चले आ रहे चलन, फूहड़ हास्य का इस फ़िल्म में कोई स्थान नही है।  यहां फूहड़ता का मतलब वयस्क हास्य से नही बल्कि शारीरिक अक्षमताओं पर किए गए उपहास, घिसे पिटे स्त्री विरोधी मज़ाक आदि से है।

सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में और अस्सी के पूरे दशक में हिंदी सिनेमा में बहुत उथल पुथल मची हुई थी। मुख्यधारा की कही जाने वाली कर्मशियल सिनेमा जो मेलोड्रामा यानी नाटकीयता से भरपूर थी सिनेमा के पटल पर हावी थी पर साथ ही समानांतर रूप से एक दूसरी तरह की सिनेमा का भी उदय हो रहा था। यह सिनेमा यथार्थवादी  विषय वस्तु का यथार्थवादी चित्रण करने के लिए जानी जाती थी। विषय वस्तु में भी हाशिये पर पाए जाने वाले समुदाय और उनके जीवन की कहानी प्रमुखता से मौजूद रहती थीं। इन दोनों प्रकार की सिनेमा के मध्य एक और प्रकार की सिनेमा इसी दौर में अपनी जगह बना रही थी और लगभग डेढ़ दशक के समय में इस सिनेमा का अपना एक अलग दर्शकवर्ग भी बन गया था।

इस सिनेमा को सिनेमा विशेषज्ञों ने नाम दिया मध्यमवर्गीय सिनेमा। इस सिनेमा में समानांतर कही जाने वाली सिनेमा की तरह यथार्थवादी चित्रण था। विषय भी यथार्थ पर आधारित थे पर यह यथार्थ विशुद्ध रूप से मध्यमवर्गीय समाज का यथार्थ था। इसमें मध्यमवर्ग के मूल्य और सिद्धांतों से ही फ़िल्म का निष्कर्ष निकलता था यानि मध्यमवर्ग जिन बातों को तरजीह देता है वही बात इस प्रकार की फिल्मों का सन्देश बन जाती थी। उदाहरण के तौर पर हृषिकेश मुखर्जी की फिल्में गुड्डी, खूबसूरत, बावर्ची आदि और बासु चटर्जी की रजनीगंधा, छोटी सी बात आदि।

इन फिल्मों से अलग कुछ फिल्में ऐसी भी थीं जो कहने के लिए तो मध्यमवर्ग सिनेमा के अंतर्गत आती थीं पर इनमें मध्यमवर्ग से जुड़ा कोई ख़ास सन्देश नही था और ना ही इनमें कोई मध्यमवर्गीय भावुकता का एंगल था। 'अंगुर' ऎसी ही एक फ़िल्म थी।  शेक्सपियर के नाटक पर आधारित यह फ़िल्म एक विशुद्ध कॉमेडी यानी हास्यात्मक फ़िल्म थी। गुलज़ार ने वैसे तो कई फिल्मों का निर्देशन किया है पर अंगूर उनकी एकमात्र कॉमेडी फ़िल्म थी।

हालांकि मध्यमवर्गीय सिनेमा में अधिकांशत: हलकी फुल्की गुदगुदाने वाली फिल्में ही बनती थीं पर अंगूर की तरह पूरी तरह से केवल हास्य पर आधारित फिल्में कम ही हुआ करती थीं। हृषिकेश मुखर्जी की 1975 में बनी चुपके-चुपके ही इस श्रेणी का एक और उदाहरण कही जा सकती है। बहरहाल अंगूर सिर्फ अपनी कहानी में ही नहीं बल्कि अपने चित्रण में भी मध्यमवर्ग के चित्रण का सटीक उदाहरण प्रस्तुत करती है। यथार्थवादी चित्रण के एक अहम मुरीद गुलज़ार ने भी इस फ़िल्म में असली लोकेशन जैसे कि बाज़ार, रेलवे स्टेशन, थियटर, दुकानों आदि में ही दृश्य फिल्माए हैं। साथ ही नेपथ्य के संगीत यानी बैकग्राउंड म्यूज़िक का बहुत कम उपयोग किया गया है। साथ ही स्टूडियो के बाहर अधिकाँश फ़िल्म के चित्रण के चलते नैसर्गिक प्रकाश का ही प्रयोग किया गया है।

इस फ़िल्म की एक और ख़ास बात है इसमें दोहरी भूमिका यानी डबल रोल के प्रयोग की। नाटक के अनुसार ही इस फ़िल्म में दो डबल रोल मौजूद थे। डबल रोल पर आधारित कई हिंदी फिल्में बन चुकी हैं पर दो डबल रोल वाली यह फ़िल्म इसे उन सब से अगल खड़ा करती है। डबल रोल की भूमिका भी इस कहानी में बेहद अलग है। दोनों ही दोहरी भूमिका वाले पात्र एक दूसरे के ठीक विपरीत नहीं हैं जैसा कि आम तौर पर डबल रोल वाली हिंदी फिल्मों में होता है। पर फिर भी चारों पात्रों की अपनी ही कुछ खासियतें हैं जो अपने आप में हास्य उत्पन्न करती हैं।  यानी हास्य के लिए पूरी तरह से डबल रोल से उत्पन्न होने वाली गलतफहमियों पर निर्भर नही रहा गया है। सहायक भूमिका वाले पात्रों को भी अपना एक अलहदा किरदार दिया गया है।

मध्यमवर्गीय अनुरूपण के कारण नाटक की कुछ ख़ास बारीकियों के चित्रण में कुछ त्रुटियाँ तो ज़रूर हैं पर नाटक के पहले से तैयार स्क्रिप्ट को नए रूप में ढालना और कहानी को लचर ना होने देना अपने आप में एक ख़ास उपलब्धि है।

साहित्य और सिनेमा के आपसी सम्बन्ध पर आधारित ये  तीन लेखों की एक श्रृंखला में पहला लेख है।  इस लेख के तर्क ओपिनियन तंदूर फ़िल्म क्लब में हुई चर्चा पर आधारित हैं।   

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