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ऐतिहासिक पर्यटन के प्रति हमारा नज़रिया कैसा हो : मैसूर महल पर विशेष

मैसूर महल, मैसूर 

ऐतिहासिक इमारतें हमारे समाज के साझा जीवन और स्मृति में मील के पत्थर के समान होती हैं। वे बताती हैं कि समय के पथ पर किस स्थान पर कौन सा पड़ाव आया था, तब क्या घटनाएँ घटित हुईं थीं और उनके क्या निशान बचे रह गए हैं। पर इन इमारतों को देखने में हमसे एक भूल हो जाती है। जैसा कि एक अंग्रेज़ी कहावत में कहा जाता है शायद हम जंगलों को देखने के बजाय सिर्फ पेड़ों को देखकर रह जाते हैं। यानि इन ऐतिहासिक इमारतों को देखते हुए हम सिर्फ इनके भौतिक रूप को देखते हैं  और इनसे जुड़े कालखंड और उसके ऐतिहासिक-सामाजिक परिवेश को देखना भूल जाते हैं।

ऐतिहासिक इमारतें वास्तुकला के मद्देनज़र तो महत्वपूर्ण होती ही हैं पर यह वास्तुकला सामाजिक-ऐतिहासिक पहलुओं से अनछुई नहीं होती। फिर भी क्यों ऐतिहासिक पर्यटन के अधिकांश दृष्टिकोण (खासकर लोकप्रिय दृष्टिकोण) में हम इन बातों की अनदेखी कर देते हैं? हम इमारतों की नक्काशियों, कोण, गुम्बदों, खम्भों आदि पर तो ध्यान देते हैं पर भूल जाते हैं कि ये सभी खासियतें समय और समाज से अलग किसी शून्य में नहीं टिकी हैं।


ये भूल तब और स्पष्ट हो जाती है जब हम ध्यान देते हैं कि अधिकतर ऐतिहासिक इमारतों की नींव में किसी ना किसी साम्राज्यवाद की छाप छूटी होती है। जिन कालखंडों और सामाजिक-ऐतिहासिक परिवेशों के ये प्रतीक हैं, उस समय से हम अब काफी आगे चुके हैं। उस समय से अब हमारी इतनी दूरी बन चुकी है कि हम इन इमारतों को एक आलोचनात्मक और मीमांसा की दृष्टि से देख सकते हैं

मैसूर का महल दक्षिण भारत में वुडियार वंश के सदियों तक चले शासन का एक भव्य प्रतीक है जो आज पूरे देश के सबसे लोकप्रिय पर्यटन-आकर्षणों में से एक है। खास कर दशहरे पर इसकी साज-सज्जा की सभी जगह चर्चा रहती है। परंतु इसके अलावा भी इस भव्य महल की वास्तुकला आधुनिक इतिहास के महलों की सबसे बेहतरीन वास्तुकलाओं की फेहरिस्त में शुमार की जा सकती है। 


 

चाहे वह इस महल के दरवाज़ों और छतों में लकड़ी पर की गई सुन्दर नक्काशी हो या फिर इसके खूबसूरत रंगीन खंभे हों या आलीशान गलियारे और हॉल या फिर सोने से जड़े शीशों के फ्रेम या राजा और अन्य मेहमानों के बैठने के लिए भव्य गैलेरी या छत पर बनीं तस्वीरें जिनमें भारतीय और यूरोपीय कला का समावेश देखने को मिलता है, इन सभी सुन्दर आकर्षक वास्तुकला की संरचनाओं से यह महल पर्यटन के लिए एक आदर्श स्थल बन जाता है।
छत पर बनीं यूरोपीय और भारतीय शैलियों  की चित्रकलाएं 
महल का एक खूबसूरत आँगन 

राजाओं और मेहमानों के लिए विशिष्ट भव्य गैलेरी जो महल के बाहर का दर्शन कराती है 

पिछले कई दशकों में यहाँ नित आने वाले पर्यटकों की संख्या में भी भारी इज़ाफा हुआ है। वुडियार वंश इस महल में किस शान--शौकत से रहा करता था और इस प्रांत पर राज किया करता था इसकी झलक महल के दौरे के पहले पड़ाव में ही दिख जाती है जहाँ दशहरे के उत्सव पर शहर में निकलने वाली राज परिवार की सवारी का चित्रण हाथ से बनीं भव्य तस्वीरों में किया गया है। वहीं एक संग्रहालय में राज परिवार को देश-विदेश के अतिथियों द्वारा भेंट की गईं अमूल्य वस्तुओं की प्रदर्शनी लगी हुई है। जैसे-जैसे आप महल को और अंदर से देखते हैं तो भव्य हॉल, द्वार, छतें, तस्वीरें, सिंहासन आदि देखकर इस वंश की समृद्धि का अंदाज़ा आपको लगता जाता है।



दशहरे के अवसर पर निकलने वाली राजसी परेड का चित्रण करती तस्वीरें 

ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, इस महल का निर्माण इसी स्थल पर बने पिछले महल के एक प्रचंड आग में जल जाने के बाद हुआ था। इस महल का नक्शा अंग्रेज़ी वास्तुकार हेनरी इरविन ने बनाया था और इसे बनने में तकरीबन 20 साल का समय और 41,47,913 रुपए की लागत आई थी और यह वर्ष 1912 में बनकर तैयार हुआ था।

इन ऐतिहासिक तथ्यों पर अगर एक बार को वस्तुपरकता से नज़र डालें तो कुछ बातें साफ स्पष्ट होती हैं। जिस समय-अंतराल में ये महल बनना शुरु हुआ और बनकर खत्म हुआ, वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के और प्रबल होने का समय था। ना सिर्फ काँग्रेस का गठन हो चुका था, बल्कि ये दल अब भारतीय राजनीति में काफी सक्रिय हो चुका था और राष्ट्रवादी स्वतंत्रता आंदोलन में अच्छी तरह से जुड़ चुका था। साथ ही कई राष्ट्रवादी नेता इस समय प्रमुखता से उभर चुके थे।

यानि जिस समय भारत में स्वतंत्रता आंदोलन, नवजागरण और अनेक ऐसे महत्वपूर्ण आंदोलन विकसित हो रहे थे, इस महल को लाखों की लागत से बनाया जा रहा था। वुडियार शासकों का अंग्रेज़ी शासकों के खिलाफ ना जाना स्वाभाविक बात थी, क्योंकि उन्हीं के संरक्षण में वे अपना राज-पाठ संभाल रहे थे। राजनैतिक कारण शासकों को किसी भी समयकाल में कुछ निर्णय लेने पर मजबूर कर सकते हैं। पर खास बात है कि इसी समय अंग्रेज़ों की दमनकारी और शोषक नीतियों के कारण भारत के कई हिस्सों में जनता की हालत खस्ता थी। स्वतंत्रता आंदोलन में कई लोगों के जुड़ने का कारण ही यह आर्थिक शोषण था। अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन में ना जुड़ना जहाँ इन शासकों का राजनैतिक निर्णय हो सकता है वहीं अपने महल के निर्माण में इतने अधिक धन का व्यय करने के निर्णय में कोई राजनैतिक विवशता नहीं थी। फिर भी उस समय में लगभग आधा करोड़ रुपया एक महल बनाने में लगा देना बहुत आपत्तिजनक लगता है। समय ने करवट ली तो अंग्रेज़ी शासन भी गया और साथ ही भारत से राजशाही भी जाती रही। लोकतंत्र आया और जिस महल में इतनी शान-ओ-शौकत को  बिखेरा और संजोया गया था आज उसी में टिकट लेकर आम लोग घूम सकते हैं और तस्वीरें ले सकते हैं। समय के शासन के सामने सभी शासन घुटने तक देते हैं शायद।  


समय के साथ सभी राजसी प्रतीक सिर्फ पर्यटन और प्रदर्शन के लिए रह जाते हैं 

इस तर्क का यह अर्थ नहीं है कि मैसूर के महल या ऐसी किसी भी ऐतिहासिक इमारत का बहिष्कार कर दिया जाए जो किसी दमनकारी, शोषक, साम्राज्यवादी ताकत द्वारा बनाई गई हो या जिसमें सामाजिक-राजनैतिक उपेक्षा निहित हो। हर तरह के इतिहास से साक्षी होना प्रबुद्ध समाज का दायित्व है फिर चाहे वह प्रिय हो या अप्रिय हो। पर इतिहास को जनतांत्रिक और प्रगतिशील मूल्यों से जुड़े संदर्भ में देखना आवश्यक है। ऐसे दृष्टिकोण से ताज महल सिर्फ एक प्यार की अमिट निशानी नहीं रहती, राजस्थान के महल सिर्फ राजपूताना शौर्य और परंपरा के प्रतीक नहीं रहते और मैसूर का महल एक दक्षिण-भारतीय शासक वंश की धरोहर नहीं रहतीं। ये सभी अपने-अपने समय के सामाजिक-ऐतिहासिक परिवेश में शासकीय वर्ग की विचारधारा और दबदबे के प्रतीक हैं जिनमें इस देश के लोगों के आर्थिक, मानव और पर्यावरणीय संसाधनों का (प्रायः असमानता के मूल्यों पर) उपयोग हुआ है।    

भारत के जनतांत्रिक युग में इससे पहले के इतिहास की निशानियाँ, ख़ास कर वो जो इमारतों के रूप में मौजूद हैं उन्हें मात्र पर्यटन के रूप में देखने के बजाय हमें उनका मूल्यांकन आज के जनतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर करना चाहिए। मैसूर का महल उस समय के भारत में जब अंग्रेज़ो द्वारा भारतीयों का उत्पीड़न और दमन किया जा रहा था, एक द्वीप की तरह खड़ा दिखता है जो इन  सभी सामाजिक-राजनैतिक सच्चाइयों से अनछुआ रहना चाहता था। पर वास्तविकता में ऐसा होना संभव नहीं है। हम चाहकर भी अपनी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक वास्तविकता से अनछुए नही रह सकते हैं। सभी ऐतिहासिक इमारतों को आधुनिक और प्रगतीशील नज़रिए से जोड़कर देखने की परम्परा द्वारा आज के ऐतिहासिक पर्यटन के प्रारूप को बदलना बेहद आवश्यक है।  

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