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History/ अब तक

Opinion तंदूर was started as a college level magazine for internal circulation in 2008. The magazine basically aimed at giving a platform for people to express their views, as the tagline ran "Because views don't cook themselves". To give equal space to both English and Hindi writers and bridge the gap between the readers of the two languages, the magazine since its first edition was brought out in the two languages. Printed on an A-2 sheet, folded into four pages, and then photocopied the magazine had humble black and white beginnings with only two writers. In a year, the number of writers increased by many folds, three issues came out in colour and the small little magazine was able to secure advertisements from local establishments as well. In all in 2008, seven issues were published before the magazine went into a four year long sabbatical. However by the last issue, the magazine also managed to host itself on an online blog, a project which remained unfinished.

Now based in Agra, in November 2012 the blog was restarted, albeit with a new idea and a renewed sense of purpose.The tagline was changed to "Because half baked opinions are always harmful!" Opinions are important but they should not crop up without a thorough investigation. In its new avatar the blog has now hosted different articles on culture, politics, policy, society, film and television, travel, city festivals, eye witness accounts, theatre, urban infrastructure and commerce. Plus there have been occasional cartoons and photo essays as well to provide a different flavour to the readers of this blog. In coming days, readers can look forward to a few book reviews and more investigative stories.

More later.

 Opinion तंदूर को २००८ में कॉलेज के स्तर पर एक प्रिंट मैगज़ीन की तरह शुरू किया गया था। उद्देश्य था की लोगों को अपने विचार और राय सबके सामने रखने के लिए एक माध्यम मिले। कोशिश थी कि ऐसा करने में उनके अपने विचार और पक सकें और परिपक्व हो सकें। इसीलिए इस मैगज़ीन को ओपिनियन तंदूर का नाम दिया गया।  एक और उद्देश्य था हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं के लेखकों और पाठकों के बीच खडी दीवार को गिराना और भाषा की सहूलियत को एक बाधा बनाने से बचाना। इसलिए इस मैगज़ीन में हमेशा से हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में लेख प्रकाशित किए गए।  ए २ शीट को बीच से मोड़कर, उसका फोटोस्टेट कर बनी इस छोटी सी मैगज़ीन ने एक साल में लंबा सफर तय किया। साल के अंत तक इसके सात अंक निकले जिनमे से तीन कलर में भी थे।  साथ ही दो लिखने वालों से शुरू हुए इस सफर में कई और साथी भी जुड़ गए। मैगज़ीन ने कुछ आर्थिक सफलता का स्वाद भी चखा जब इसे कुछ विज्ञापन मिले। साल के  अंत तक इस मैगज़ीन के नाम पर एक ब्लॉग भी शिरू किया गया पर जल्द ही इसके सफर में चार साल का लंबा अंतराल आ गया।

अब आगरा शहर में स्थित २०१२ में ब्लॉग के माध्यम से ओपिनियन तंदूर फिर जीवित हुआ पर एक बदले स्वरूप में।  अब सिर्फ विचार ही काफी नही थे पर उनके पीछे की गई मेहनत भी ज़रूरी थी।  पूरी छानबीन और तथ्यों की परख के बिना विचारों को गढ़ना अपने लिए ही नही बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक है।  अब तक संस्कृति, राजनीति, समाज, आर्थिक विषय, रंगमंच, शहरी महोत्सव, शहरी ढाँचे, यात्रा, फिल्म और टी वी आदि पर इस ब्लॉग पर  कई लेख प्रकाशित किए गए हैं।  साथ ही इक्का दुक्का कार्टूनों  से भी लोगों का ध्यान कुछ मुद्दों पर खींचने की कोशिश की गई है। आने वाले समय में समीक्षाओं और कुछ खोजी लेखों को इस ब्लॉग में जोड़ने की कोशिश रहेगी।

शेष फिर।














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हिन्दी एक्शन-फंतासी कॉमिक उपसंस्कृति की यात्रा- इंद्रजाल से लेकर राज कॉमिक्स तक

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क्योंकि यह उपसंस्कृति भाषा से निर्मित होती है, इसलिए अलग-अलग भाषाएँ और उनका सामाजिक संदर्भ इन उपसंस्कृतियों का स्वरूप निर्धारित करते हैं। हिन्दी भाषा में आधुनिक समय में पहला एक्शन और फंतासी का गठजोड़, हिन्दी साहित्य के पहले उपन्यासों में से एक, देवकी नंदन खतरी द्वारा रचित ‘चंद्रकांता’ में देखा जा सकता है। तिलिस्म और एक्शन से भरपूर इस उपन्यास में कई ऐसे तत्व थे जिन्होंने इस रचनावली को उस समय में ही नहीं, बल्कि आगे के समय में भी लोगों के लिए रोचक और आकर्षक बनाए रखा।
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