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प्रयोगात्मक नाट्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण: रंगलोक द्वारा 'वनमाखी' की प्रस्तुति

वनमाखी में गरिमा मिश्रा (साभार: रंगलोक सांस्कृतिक संस्थान)

सूरसदन सभागर के तल में बने छोटे से मंच पर शनिवार शाम नाट्य कला का एक अनूठा प्रयोग किया गया। रंगलोक सांस्कृतिक संस्थान के निरन्तर चलते प्रयासों में एक और इज़ाफा करते हुए गरिमा मिश्रा ने अपने अभिनय से सारांश भट्ट द्वारा परिकल्पित एकल प्रस्तुति को अंजाम दिया। मंचन का नाम था “वनमाखी” जो कि मनीषा कुलश्रेष्ठ की पुरस्कृत कृति “कठपुतलियाँ” पर आधारित था। खास बात यह है कि सबसे कठिन नाट्य प्रस्तुतियों में से एक एकल प्रस्तुति
, इस शाम का एकमात्र प्रयोगात्मक प्रयास नहीं था। 


नाट्य विधा, कथावस्तु, नाट्य शैली और तकनीकी व्यवस्था, सभी मायनों में इस प्रस्तुति ने आगरा शहर के दर्शकों का कई आयामों से परिचय कराया। लघु-कथाओं को नाटक में ढालने के मौजूदा दौर में नाटकों के लिए संभावनाएँ कई गुना बढ़ चुकी हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ की पुरस्कृति कहानी ‘कठपुतलियाँ’ को भी इसी नाट्य प्रवृति के तहत ‘वनमाखी’ नाटक में तब्दील किया गया। राजस्थान के ग्रामीण परिदृश्य में एक स्त्री के छोटे उम्र में एक बड़ी उम्र के, दो बच्चों के विधुर पिता से विवाह के बाद के जीवन पर आधारित यह नाटक, स्त्री के जीवन के सामाजिक और वैयक्तिक पक्षों को उजागर करता है।

सामाजिक परिदृश्य के मद्देनज़र इस नाटक में बेमेल विवाह, मानव तस्करी और खाप पंचायतों के तानाशाही रवैयों की बात की गई। जहाँ मौजूदा समय में इन मुद्दों को उठाना एक साहसिक कदम है, वहीं इस साहस को एक कदम और आगे ले जाते हुए इस नाटक में स्त्री की दैहिक और यौनिक स्वायत्तता के विषय को पुरी स्पष्टता और सूक्ष्मता के साथ प्रस्तुत किया गया। हालांकि आज के समय में मुख्यधारा में इस विषय को शहरी पृष्ठभूमि में कई प्रकार से दिखाया जा रहा है, पर ग्रामीण परिवेश में इस मुद्दे की बात करने से इसकी कथावस्तु की सार्थकता में कई परत जुड़ गईं।

ऐसे क्लिष्ट विषय को एक आत्मीय माहौल में लगभग एक घंटे की प्रस्तुति में अपने अकेले के अभिनय से प्रस्तुत करना आसान नहीं है, पर गरिमा मिश्रा ने सुघड़ता और विवेक के साथ इस मुश्किल काम को बखूबी अंजाम दिया। खास बात थी कि अकेले ही गरिमा ने कई सारे किरदारों को निभाया, जिनके शारीरिक लक्षणों और व्यक्तित्व की पृथकता को दर्शकों के सामने उभारने में वह सफल रहीं। संवाद, नृत्य, गायन और बेहद श्रमशील अभिनय में लगातार ऊर्जावान बने रहना भी एक कठिन चुनौती थी जिस पर उन्होंने मुस्तैदी से जीत पाई।

तकनीकी रूप से भी नाटक में कई प्रयोग किए गए। किसी भी कलात्मक विधा का उस समय के सांस्कृतिक और सामाजिक दौर के अनूकूल प्रासंगिक बने रहना महत्वपूर्ण है और नाट्य विधा में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। प्रस्तुति में अलग-अलग स्थान पर संगीत का प्रयोग तो किया ही गया, पर साथ ही मानव तस्करी के विषय को उजागर करने के लिए नाटक के बीच में ही इस विषय पर टीवी समाचार की एक क्लिप को प्रोजेक्टर के माध्यम से मंच पर प्रदर्शित किया गया। इस तरह से आधुनिक संचार माध्यमों का नाट्य विधा में समावेश कर नाटक की परिकल्पना में नवीनता का परिचय मिला।

एक प्रयोग जो संभवत: रंगमंच के मद्देनज़र सबसे महत्वपूर्ण था और जो रंगमंच के दर्शकों को शायद नाट्य कला के बारे में बहुत कुछ सिखा भी गया वह था नाटक संरचना में प्राय: विश्व युद्ध के दौर में सक्रिय प्रख्यात जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख़्ट के नाट्य दर्शन का इस्तेमाल करना। जैसा कि सारांश और नाटक के संरक्षक डिम्पी मिश्रा ने बताया, ब्रेख़्ट की नाट्य शैली नाटक विधा में एक प्रयोगात्मक कदम थी। इसके अंतर्गत चलते हुए नाटक में अचानक किसी क्षण में कलाकार अपने किरदार और साथ ही नाटक से बाहर निकलकर सीधे दर्शकों से अनौपचारिक संवाद स्थापित कर देती है जिसे नाटक और सिनेमा में “फोर्थ वॉल” यानि चौथी दीवार को ध्वस्त करना कहा जाता है।

इस दर्शन के पीछे एक विशिष्ट वैचारिक और दार्शनिक मकसद है। अकसर नाट्य कलाओं में प्रस्तुति की पटकथा और कलाकार के अभिनय में दर्शक बह निकलते हैं। पर इस तरह के व्यवधान से दर्शक का कलाकार और प्रस्तुति से जुड़ा संबंध अचानक से टूट जाता है और एक अलगाव हो जाता है। इस अलगाव से ना सिर्फ दर्शक का प्रस्तुति में निहित भावनाओं से मोहभंग हो जाता है बल्कि उस व्यवधान के क्षणों में दर्शक तब तक के घटे घटनाचक्र को लेकर अचानक सजग हो उठता है। अंतत: प्रयास यह रहता है कि नाटक के अंत में दर्शक अपने साथ नाटक को लेकर कुछ विचार और सोच लेकर जाए, ना कि प्रस्तुति को एक अनुभव मान भूल जाए।

एकाकी प्रस्तुति में इस तरह का प्रयोग करना और भी पेचीदा और साहसपूर्ण था। अलग-अलग किरदारों को निभा रहीं गरिमा को पहले तो दर्शकों को निरन्तर बाँधे रखना था और फिर खुद ही इस बंधन को अचानक तोड़ कर फिर स्थापित करना था। इस कार्य को सफलतापूरवक कर पाने का श्रेय उनके अभिनय और नाटक की परिकल्पना, दोनों को ही जाता है।

एक आत्मीय से माहौल में दैहिक स्वायत्तता का विषय, ब्रेख़्टियन नाट्य संरचना का प्रयोग, एकल प्रस्तुति और एक बेहद संजीदा कहानी, इस नाटक में एक नहीं बल्कि अनेक ऐसे प्रयोग थे जो दर्शकों को बौद्धिक, वैचारिक और यहाँ तक कि दार्शनिक स्तर पर बहुत कुछ सोचने और साथ ही समझने पर विवश करते हैं। आज के समय में जहाँ प्रदर्शनीय कलाओं में उपभोक्तावादी सोच और मूल्य हावी होते जा रहे हैं, वहाँ आगरा जैसे शहर में जहाँ नाटक कला अभी भी अपने पाँव पसार रही है, ऐसी प्रयोगात्मक प्रस्तुति सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक परिदृश्य में बेहद आवश्यक और प्रशंसनीय कदम है।          

-सुमित 

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