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Showing posts from May, 2017

Sarabhai VS Sarabhai-Take 2: An Old Favourite Returns with Aplomb

Humour is a tricky thing. While all storytelling works with tropes and archetypes, in comedy the compulsions of evoking laughter often reduces them to stereotypes which can breed insensitive and politically incorrect humour. Comedies often require one person or several people in the script to be funny with acerbic observations about each other. The way their humour and character are constructed and how they deliver their performances makes a lot of difference in how these comedies turn out. If observations are unevenly balanced in favour of one of the characters more than all others, the point of view of the script becomes that of the dominant character. If the dominant character represents a biased or a bigoted view, then the show is invariably reduced to perpetuating unfair stereotypes and making politically incorrect and insensitive commentaries.
While there are plenty of comedies doing the rounds presently that illustrate this phenomenon, there are very few which do the reverse. …

प्रयोगात्मक नाट्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण: रंगलोक द्वारा 'वनमाखी' की प्रस्तुति

सूरसदन सभागर के तल में बने छोटे से मंच पर शनिवार शाम नाट्य कला का एक अनूठा प्रयोग किया गया। रंगलोक सांस्कृतिक संस्थान के निरन्तर चलते प्रयासों में एक और इज़ाफा करते हुए गरिमा मिश्रा ने अपने अभिनय से सारांश भट्ट द्वारा परिकल्पित एकल प्रस्तुति को अंजाम दिया। मंचन का नाम था “वनमाखी” जो कि मनीषा कुलश्रेष्ठ की पुरस्कृत कृति “कठपुतलियाँ” पर आधारित था। खास बात यह है कि सबसे कठिन नाट्य प्रस्तुतियों में से एक एकल प्रस्तुति, इस शाम का एकमात्र प्रयोगात्मक प्रयास नहीं था। 
नाट्य विधा, कथावस्तु, नाट्य शैली और तकनीकी व्यवस्था, सभी मायनों में इस प्रस्तुति ने आगरा शहर के दर्शकों का कई आयामों से परिचय कराया। लघु-कथाओं को नाटक में ढालने के मौजूदा दौर में नाटकों के लिए संभावनाएँ कई गुना बढ़ चुकी हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ की पुरस्कृति कहानी ‘कठपुतलियाँ’ को भी इसी नाट्य प्रवृति के तहत ‘वनमाखी’ नाटक में तब्दील किया गया। राजस्थान के ग्रामीण परिदृश्य में एक स्त्री के छोटे उम्र में एक बड़ी उम्र के, दो बच्चों के विधुर पिता से विवाह के बाद के जीवन पर आधारित यह नाटक, स्त्री के जीवन के सामाजिक और वैयक्तिक पक्षों को उजागर…