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शीरोज़ हैंगआउट की दूसरी वर्षगाँठ- एक संवाद के दो साल


हर साल के मुकाबले इस साल सर्दियों ने समय से पहले ही आगरा शहर में दस्तक दे दी। कोहरे से लबालब माहौल में अब सर्द हवाओं का इज़ाफा भी हो गया है। पर दस दिसंबर की शाम को शहर में एक ऐसी जगह भी थी जहाँ सर्द हवाएँ बेअसर थीं। यह जगह थी फतेहाबाद रोड स्थित शीरोज़ हैंगआउट और मौका था इस कैफ़े के अपने अस्तित्व के दो साल पूरे करने का। उत्साह और गर्मजोशी से लबरेज़ इस माहौल में जश्न था, संगीत था, ठहाके थे और मुस्कुराहटें थीं।

तेज़ाबी हमले झेल चुकीं लड़कियों द्वारा संचालित शीरोज़ 10 दिसंबर 2014 को आगरा में शुरु हुआ था। इन दो सालों के सफर में ना सिर्फ इस कैफ़े ने शहर ही नहीं, देश ही नहीं बल्कि दुनिया में अपनी नींव मजबूत की पर साथ ही लखनऊ और उदयपुर में अपनी शाखाएँ शुरु कर इस बेहतरीन कोशिश को और आगे बढ़ाया।

किसी भी उद्यम के लिए दो साल पूरे करना बड़ी बात है पर शीरोज़ महज़ एक उद्यम नहीं है। पिछले दो सालों में यह एक संवाद बन कर उभरा है। यह संवाद है समाज के साथ- एक ऐसा समाज जिसमें कई प्रकार की हिंसा व्याप्त है। प्रत्यक्ष हिंसा तो तेजाबी हमले में निहित है ही पर समाज में एक और हिंसा है जो खासकर उपेक्षित वर्ग को प्रताड़ित करती है। यह हिंसा है परिभाषाओं की।

एक पितृसत्तात्मक, पुरुष प्रधान समाज स्त्री को परिभाषाओं के चक्रव्यूह में फाँस देता है। इनमें से एक परिभाषा है ‘सुंदरता’ की। स्त्री को सुंदर कहे जाने के लिए आजीवन अनगिनत मानकों पर खरे उतरते रहना पड़ता है। ये मानक भी बेहद एक-तरफा और असंवेदनशील होते हैं और महिलाओं को निरंतर नीचा दिखाते रहते हैं। इसीलिए जब कोई स्त्री पुरुष-प्रधान-समाज में किसी पुरुष के अवांछित आकर्षण को अस्वीकार करती है तो उसके साथ तेजाबी हमले जैसी घटनाएँ घटती हैं। इन हमलों के पीछे की मानसिकता होती है स्त्री से उसके अस्तित्व का मूलभूत आधार माने जाने वाली सुंदरता को उससे छीन लेना।   

ऐसे में शीरोज़ कैफ़े इ हिंसा को अपने साहस से उत्तर दे रहा है। शीरोज़ को चलाने वाली लड़कियाँ ना सिर्फ समाज की गढ़ी हुई सुंदरता की परिभाषाओं को नकार रही हैं। वे बता रही हैं कि सुंदरता मनुष्य के व्यक्तित्व से बनती है और अपने व्यक्तित्व से ही वे दुनिया-भर का दिल जीत रही हैं।

शीरोज़ हैंगआउट द्वारा प्रकाशित कैलेण्डर 

दो साल के इस सफर में शीरोज़ के साथ ना जाने कितने साथी जुड़ते गए। ना जाने कितने लोग जो इन साहसी लड़कियों से सहज रूप से मिल नहीं पाते थे, इनके मिलनसार व्यवहार और गर्मजोशी से पिघल गए और उनकी असहजता जाती रही। तेजाबी हमले से पीड़ित ना जाने कितनी महिलाएँ जो अपनी चारदीवारी में कैद हो गई थीं, उन्हें इस निराले प्रयोग ने बाहर आने का कारण भी दिया और साहस भी।

इस संवाद को दो वर्ष तक कई वास्तविक और स्वाभाविक कठिनाइयों से जूझते हुए जारी रखना बेहद कठिन काम है। इस दूसरी वर्षगाँठ के अवसर को मनाने से ठीक पहले शीरोज़ आगरा की संचालक ॠतु को अपोलो अस्पताल में एक सर्जरी करवानी पड़ी पर फिर भी इस मौके पर उसी मुस्कुराहट और जीवटता से वह कई जगहों से जुटे अपने साथियों और अतिथियों का स्वागत कर रही थीं और अपने मित्रों के साथ पूरे जोश-ओ-खरोश से आनंद उठा रही थीं।

आसान नहीं होगा इस हिंसक समाज में साहस के साथ इस संवाद को निरंतर बनाए रखना पर ना जाने कहाँ से ये शीरोज़ अपने अंदर इतनी हिम्मत और ताकत बटोर लेती हैं कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन जाती हैं। शायद इनकी जिंदगी का यही फलसफा हैकी कि-

“ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है, मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं”

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