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आगरा शहर में बदलता यातायात परिदृश्य: संभावनाएं एवं चुनौतियाँ


भारत में बढ़ते शहरीकरण के मद्देनज़र जिस ढांचागत नागरिक सेवा पर सबसे अधिक ध्यान दिया जा रहा है, वह है यातायात व्यवस्था। बढ़ते शहरों में बढ़ते फासले लोगों को और फलस्वरूप नगरीय प्रशासनों को निरन्तर चुनौती दे रहे हैं। सड़कों पर गाड़ियों की बढ़ती संख्या और मौजूदा सड़कों का इन वाहनों को पर्याप्त जगह ना दे पाना भी आधुनिक नगरीय यातायात की बड़ी चुनौतियाँ हैं।

इन दोनों ही समस्याओं के लिए मौजूदा नगरीय प्रशासन और राज्य सरकारें नित नए समाधान ढूँढने में लगे हुए हैं। अब नगरीय यातायात का मतलब सिर्फ सड़कों तक ही सीमित नहीं रह गया है। देश के अधिकाँश महानगरों में नगरीय यातायात को संभालने के लिए रेल सेवाओं जैसे मेट्रो, मोनोरेल आदि के प्रावधान किए जा रहे हैं। कुछ शहरों में लोकल ट्रेन सुविधाएँ तो पहले से ही मौजूद थीं। अब महानगरों के साथ-साथ छोटे मगर, बढ़ते हुए शहरों में भी यातायात को लेकर नए प्रयोग किए जा रहे हैं।

इस लेख में आगरा शहर के बदलते यातायात परिदृश्य को केन्द्र में रखकर यह समझने का प्रयास किया गया है कि यातायात की चुनौतियों को लेकर नए शहर किस दिशा में जा रहे हैं और इस दिशा में उठाए गए कदमों के निकटवर्ती और दूरगामी प्रभाव क्या हो सकते हैं।


रिंग रोड का जल्द उदघाटन 

पिछले कुछ दशकों में भारत में सड़कों के माध्यम से अंतर्नगरीय और अंतर्रज्यीय यातायात बहुत बढ़ा है और साथ ही गाड़ियों का व्यापार और मध्यमवर्ग और उच्च वर्ग में गाड़ियों की खपत भी बढ़ी है। सड़कों के स्तर और मात्रा में भी काफी विकास हुआ है। राष्ट्रीय राजमार्गों का निरन्तर चौड़ीकरण और साथ ही एक्सप्रेस वे मार्गों का देश भर में निर्माण इसी विकास का हिस्सा हैं।

आगरा में यातायात के परिदृश्य में भारी बदलाव की पहल हुई आगरा-नोएडा एक्सप्रेस वे के निर्माण के साथ। एक्सप्रेस वे ने नोएडा और आगरा के बीच दूरी तो कम कर ही दी पर साथ ही शहर के आंतरिक यातायात के परिदृश्य में भी भारी बदलाव छेड़ दिया। शहर में दिल्ली-एनसीआर से सैलानियों की भीड़ में भारी इज़ाफा हुआ। एक्सप्रेस वे शहर की नगरीय सीमा से दूर कुबेरपुर क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग-2 से आकर जुड़ता है जो कि मुख्य शहर से कुछ किमी के फासले पर है। ताजमहल, आगरा किला आदि तक पहुँचने के लिए सैलानियों को एन एच-2 से शहर के अंदर जाने के लिए शहर की अंदरूनी सड़कों से होकर जाना पड़ता है जो मुख्य संडकों के मुकाबले काफी सकरी है और सप्ताहांत में आने वाली भारी मात्रा में सैलानियों की भीड़ के लिए पर्याप्त नहीं है।

रिंग रोड का निर्माण कार्य लगभग पूरा होता हुआ 

इस समस्या से जुझने का एक उपाय अब तैयार होने वाला है। यह है आगरा शहर के वृत्त में बनने वाली रिंग रोड जो फतेहाबाद रोड को सीधे राष्ट्रीय राजमार्ग से आगरा-नोएडा एक्सप्रेस वे के उद्गम पर जोड़ती है। इस रिंग रोड का काम लगभग पूरा हो चुका है और आने वाली 2 अक्तूबर को गाँधी जयंती के मौके पर इसका उद्घाटन किया जाना प्रस्तावित है। एक्सप्रेस वे के बाद यह रिंग रोड आगरा शहर की सीमा में पड़ने वाली सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण सड़क मानी जा सकती है। फतेहाबाद रोड पर इसका जुड़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी सड़क से ताज महल के पूर्वी द्वार पर जाया जाता है। इसके अलावा इस सड़क पर राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर के सभी बड़े होटल स्थित हैं। एक्सप्रेस वे के बनने के बाद इन होटलों की संख्या में भारी इज़ाफा हुआ है और यह सड़क सैलानियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बन गई है।

रिंग रोड के बनने से सबसे बड़ा फायदा होगा शहर के अंदर के यातायात परिदृश्य, जो कि पहले बताया गया है फिलहाल बेहद व्यस्त और अव्यवस्थित हो चुका है। दूसरा फायदा दूरगामी प्रभाव को लेकर है। जैसे-जैसे आगरा शहर बढ़ रहा है इसकी नगरीय सीमाएँ भी बढ़ रही हैं और हर नए-पुराने हिस्से में रहने वालों की भीड़ भी बढ़ रही है। साथ ही एक्सप्रेस वे के बनने से होटल व्यवसाय तो बढ़ा ही है, पर साथ ही दूसरे उद्योगों की संभावनाएँ भी बढ़ गई हैं। ऐसे में कुछ ही वर्षों में शहर की जन्संख्या के और भी बढ़ने के आसार हैं। ऐसे में ना सिर्फ सैलानियों पर शहरवासियों की भीड़ को भी संभालने के लिए अधिक से अधिक मुख्य सड़कों की आवश्यकता रहेगी जो किसी प्रकार से पूरे शहर के विभिन्न हिस्सों को आपस में बाँधती हों।

दो अक्तूबर को इसके उद्घाटन की बात तो चल रही है पर जिस सड़क- फतेहाबाद रोड, से यह रिंग रोड जुड़ रही है, उसके सुधार और चौड़ीकरण का काम अभी तक शुरु नहीं हुआ है। जिस जगह पर यह सड़क जुड़ रही है, वह खालिस ग्रामीण इलाके में पड़ता है। यहाँ की रिहाइश और दुकानों आदि का क्या होगा यह अभी देखना होगा। हालांकि यह तय है कि इस क्षेत्र में जितनी भी ज़मीनें हैं उनके दाम आजकल आसमान छू रहे हैं। नए होटलों के खुलने से इस क्षेत्र में व्यवसाय और रोज़गार के मौके भी बढ़ सकते हैं। कहा जा सकता है कि शहरीकरण के उपाय के रूप में बन रही इस रिंग रोड के कारण, बेहद ग्रामीण इलाकों में त्वरित शहरीकरण देखने को मिल सकता है।

राष्ट्रीय राजमार्ग का फंसा पेंच

राष्ट्रीय राजमार्ग-2 पर रुके हुए कार्य से आगरा में अक्सर लगाने वाले जाम की स्थिति 
जहाँ एक तरफ रिंग रोड बन कर तैयार होने को है, वहीं पिछले ही वर्ष राष्ट्रीय राजमार्ग को चार से छ: लेन में तब्दील करने का काम छेड़ा जा चुका है। एन एच-2 पर पड़ने वाले शहर के कुछ खास चौराहों पर, जहाँ खासी भीड़ रहती है, ट्रैफिक को सुगम बनाने के लिए फ़्लाइओवर का निर्माण शुरू किया गया था। इससे, पहले-पहल शहर वासियों में खासा उत्साह देखा गया पर मौजूदा सड़क के खोदे जाने, सारा ट्रैफिक पतली सर्विस रोड पर संचालित करने और शहर के मुख्य भाग में पड़ने वाले राजमार्ग के लगभग पूरे हिस्से के दुर्गम होने के बाद यह उत्साह अब ठंडा पड़ता जा रहा है।

राजमार्ग पर छोटे-बड़े व्यवसाय मौजूदा निर्माण कार्य की धीमी गति से पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गए हैं। पिछले कई महीनों से काम के लगभग ठप पड़े होने से आम लोगों में गुस्सा और निराशा बढ़ते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि काम रुका होना सिर्फ लोगों की भ्रांति है। काम के बेहद धीमी गति से बढ़ने के चलते रिलायंस कंपनी को मिला इस काम का ठेका रद्द किये जाने के संकेत मिल रहे हैं। इस वर्ष अधिक बारिश होने के कारण परेशानियाँ और बढ़ गई हैं। काम की वजह से फैली धूल-मिट्टी, टूटे पत्थर और गिट्टी का अंबार लगा हुआ है। जहाँ गड्ढे हुए हैं वहाँ बारिश के पानी से भराव हो गया है जो राहगीरों की दिक्कतें और बढ़ा रहा है। इस काम के शुरु होने से पहले भले ही राजमार्ग चार लेन का था और आगे जाकर इसकी हालत और खराब हो चुकी थी, पर अब इस सड़क को पहचान पाना मुश्किल हो चुका है और जो परेशानियाँ ट्रैफिक ज़्यादा होने के कारण आतीं थीं, वो अब और बढ़ गईं हैं। अब यह कार्य कब तक पुन: आरम्भ होगा और कब समाप्त हो सकेगा इसका अनुमान लगाना कठिन है। 

मेट्रो ट्रेन के मंडराते बादल

शहर के बीचोंबीच फैले राजमार्ग का रुका हुआ कार्य यदि अगले वर्ष के जून महीने तक पूरा ना हुआ, तो दिक्कतें और बढ़ सकती हैं। इसका कारण है, हाल ही में हुई घोषणा कि आगरा की मेट्रो परियोजना को प्रदेश सरकार से हरी झंडी मिल गई है और इसके काम की शुरूआत जून 2017 में होना तय किया गया है। यदि यह काम समय से शुरु हुआ तो ना सिर्फ शहर भर में, बल्कि राजमार्ग पर भी प्रस्तावित मेट्रो स्टेशनों का काम शुरु हो सकता है।

इस काम के शुरु होने पर भी ऊँचे-ऊँचे खंभों को जगह जगह खड़ा किया जाने लगेगा। कई जगहों पर स्टेशन बनने के कारण बहुत सा निर्माण कार्य भी शुरु हो जाएगा। इस निर्माण कार्य के कारण भी आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त होगा। राजमार्ग की ही बात करें तो इस निर्माण कार्य की दोहरी मार आने-जाने वालों और स्थानीय व्यवसायों के लिए निकट भविष्य में बेहद कठिनाई पेश करेगी।

राजमार्ग से हटकर मेट्रो कार्य के पूरे ही शहर में संभावित प्रभावों पर नज़र डालना भी आवश्यक है। हालांकि पहली मेट्रो रेल कोलकाता में 80 के दशक में ही चलने लगी थी, पर भारत के अधिकाँश शहरों में इस रेल यातायात की व्यवस्था को लेकर उत्साह तब बढ़ा जब दिल्ली में 2005 में यह बन कर तैयार हुई। पूरे देश में दिल्ली की मेट्रो रेल के चर्चे हो गए। शायद देश में उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद शुरु हुई इस मेट्रो रेल परियोजना के पास कोलकाता मेट्रो के मुकाबले यही सबसे बड़ा फायदा था कि यह भारतीय बाज़ार में अंतराष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैर फैला लेने के बाद आई। मेट्रो रेल परियोजना अब देश और वैश़्विक बाज़ार के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक अवसर बन कर उभरी है।

United Kingdom Trade and Investment Department की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 20 से भी अधिक शहरों में 40 से भी अधिक मेट्रो परियोजनाएँ या तो प्रस्तावित हैं या फिर निर्माणाधीन हैं। इन मेट्रो परियोजनाओं की कुल लागत के 74% मूल्य की परियोजनाओं के लिए अंतराष्ट्रीय कंपनियाँ भी दावेदारी पेश कर सकती हैं। जहाँ भारतीय मेट्रो परियोजनाएँ के लिए निवेश अंतराष्ट्रीय विकास बैंकों से आ रहा है, वहीं इन रेल परियोजनाओं में विभिन्न कार्यों के निर्वाह के लिए चीन, जापान, फ़्रांस, कोरिया, स्पेन, स्विट्ज़रलैंड, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों की कंपनियाँ, भारतीय मेट्रो प्राधिकरणों के साथ करार कर रही हैं। यानि भारतीय शहरों में मेट्रो रेल परियोजनाएँ ना सिर्फ भारत के शहरों और राज्यों में महत्वपूर्ण बन गई हैं, बल्कि अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में भी महत्व रखती हैं।
     
जहाँ पहले कुछ समय में बड़े शहर जैसे दिल्ली, बंगलूरु, चेन्नई आदि में इन मेट्रो रेल परियोजनाओं की शुरूआत हुई वहीं पिछले कुछ समय में इनके तुलना में छोटे कहे जा सकने वाले शहरों में इन परियोजनाओं का प्रस्ताव, नगरीय यातायात व्यवस्था के हेतु दिया जा रहा है। ऐसे में मेट्रो परियोजनाएँ ना सिर्फ शहरवासियों को लुभाने का काम कर रही हैं, पर साथ ही वैश्विक और राष्ट्रीय वाणिज्य के लिए भी रुचि पैदा कर रही हैं।

पर जहाँ मेट्रो परियोजना से कई सम्भावित लाभ हो सकते हैं, वहीं यह समझना आवश्यक है कि इस परियोजना का आगरा जैसा शहर में कैसा क्रियान्वयन होगा और इससे शहर के मूलभूत ढांचे और आबो-हवा पर क्या असर पड़ेगा। मेट्रो परियोजनाओं में ज़मीन के ऊपर और नीचे, दोनों ही जगह काम किया जाता है। अभी तक जिन शहरों में यह परियोजनाएँ शुरू हुई हैं, वे देश के सबसे विकसित शहरों में से थे, पर इनकी तुलना में आगरा जैसे छोटे शहरों के पास ना तो चौड़ी सड़कें हैं और ना ही वैकल्पिक सड़कों का जाल है। मेट्रो निर्माण कार्य के लिए इन दोनों की ही आवश्यकता है, जिससे मौजूदा ट्रैफिक को नियंत्रित किया जा सके। इनके ना होने से ऐसे शहरों में जाम, यातायात की बदइंतज़ामी और स्थानीय व्यवसायों को नुकसान जैसी समस्याएँ उभर सकती हैं।

इसके अलावा एक दूसरी समस्या, जिसका बड़े शहरों को भी सामना करना पड़ा है, वह है प्रदूषण। मेट्रो निर्माण कार्य से उपजी मिट्टी, धूल और अन्य कचरा शहरों की हवा को तो खराब करता ही है पर साथ ही पानी के निकासी के स्त्रोतों को भी जाम करता है। भारतीय शहरों के जल निकासी की व्यवस्था वैसे भी बेहद खराब है। आज तक कई बड़े शहरों में भी सीवर की व्यवस्था पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई है। नालियों के चोक हो जाने के कारण सड़कों पर, खास कर मॉनसून के मौसम में, पानी भर जाना लाज़मी हो जाता है, जिससे ना सिर्फ सड़कों को नुकसान होता है बल्कि शहर में यातायात व्यवस्था भी प्रभावित होती है। और यदि मॉनसून इस वर्ष जैसा हो तो इन समस्याओं के भयावह रूप लेने की संभावनाएँ और बढ़ जाती हैं, जैसा कि इस बार गुड़गाँव शहर में हुआ।

यातायात का भविष्य: स्थानीय स्तर पर सशक्तिकरण की आवश्यकता 

यातायात व्यवस्था को लेकर कई प्रकार के प्रयोग किए जा रहे हैं। आगरा जैसे उभरते हुए शहर में रिंग रोड का बनना शहर में भविष्य में होने वाले परिवर्तनों के चलते महत्वपूर्ण तो है ही पर साथ ही कई महत्वपूर्ण परिवर्तनों जैसे कि बढ़ते शहरीकरण को जन्म भी दे रहा है। पर जहाँ राज्य सरकार की यह परियोजना जल्द ही पूर्ण होने वाली है और संभवत: शहर के यातायात परिदृश्य में बड़ा बदलाव करने वाली है, वहीं केन्द्र सरकार द्वारा छेड़ी गई राजमार्ग परियोजना खटाई में पड़ गई है। एन एच-2 पर यातायात की व्यवस्था खराब हो चुकी है जिसके सुचारु होने में समय लग सकता है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या अब समय नहीं आ गया है कि शहरों और गाँवों को स्थानीय स्तर पर यातायात और अन्य मूलभूत ढांचागत प्राथमिकताओं और योजनाओं पर निर्णय लेने के लिए सशक्त किया जाए, जिनके सुझावों पर राज्य और केन्द्र सरकारें आपसी समन्वय बनाकर नगरीय व्यवस्थाओं पर नीतिगत फैसले लें। महत्वपूर्ण परियोजनाओं में भी निर्धारित कार्यों को कितने चरणों में किया जाना है और कैसे पूरा किया जाना है, इसके लिए स्थानीय प्रशासन को साथ लेना आवश्यक है।

साथ ही यातायात परिदृश्य में रेल सेवाओं को बेहद महत्व दिया जा रहा है पर अफसोस की बात यह है कि इसके लिए इन शहरों में पुरी तरह से नए सिरे से काम छेड़ा जा रहा है। अधिकांश भारतीय शहरों में रेल सेवाओं, यानि रेल ट्रैक और स्टेशनों का जाल बहुत समय पहले से बिछा हुआ है। आज के समय में कई स्टेशन और ट्रैक अनुपयोगी हो गए हैं। ऐसे में इन स्टेशनों और ट्रैक, जो कि शहर के पुराने समय से विकसित क्षेत्रों में पहले से ही स्थित हैं, की पूरी तरह से अनदेखी करना और ज़मीनी स्तर से ऊपर और नीचे भारी-भरकम और बेहद खर्चीला काम छेड़ना तर्कसंगत नहीं लगता है। आगरा शहर में ही ऐसे कई स्टेशन और रेलवे लाइन हैं जो अब अनुपयुक्त हैं और जिनके साथ मेट्रो रेल के नेटवर्क को जोड़ने से ना सिर्फ शहरों के कई अंदरूनी हिस्सों तक पहुँचा जा सकता है बल्कि आस पास के ग्रामीण और देहाती क्षेत्रों तक भी पहुँचा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर मेट्रो रेल और भारतीय रेल की ई एम यू सेवाओं का मिश्रण इसका एक उपाय हो सकता है।

साथ ही यातायात व्यवस्था को अन्य नगरीय ढांचागत व्यवस्थाओं के परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है। नए निर्माण कार्य छेड़ने से पूर्व शहर की मौजूदा ढांचागत व्यवस्थाओं जैसे कि जल निकासी और सड़कों की सेवाओं का मूल्यांकन आवश्यक है, ये देखने के लिए उभरते हुए भारतीय शहर इतने बड़े स्तर के निर्माण कार्यों को झेलने के लायक भी हैं या नहीं।

पर इन सबके लिए यातायात परिदृश्य को सही दिशा में ले जाना आवश्यक है। मौजूदा समय में यातायात परियोजनाएँ राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लाभप्रद वाणिज्यिक अवसर बन कर उभर रही हैं, पर इनमें भारतीय शहर, शहरवासी और स्थानीय प्रशासन सशक्त होकर नहीं उभरे हैं जिससे वे अपने आसपास की मूलभूत प्राथमिकताओं को ना सिर्फ सही ढंग से पहचान सकें बल्कि उनकी माँग भी कर सकें।  


- सुमित  

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