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Showing posts from September, 2015

मुज़फ़्फ़रनगर की बात चली तो… :ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा-“जूठन” से परिचय।

साहित्य और समाज: मुज़फ़्फ़रनगर पिछले कुछ दिनों बेहद गलत कारणों से चर्चा में रहा। सांप्रदायिक हिंसा और हज़ारों लोगों (खास कर अल्पसंख्यकों) के अपनी जान, ज़मीन और प्रियजनों से हाथ धोने की खबरों से कोई भी शहर पहचाना जाना नहीं चाहेगा। 2013 के दंगे बहुत सुर्खियों में रहे पर मुज़्ज़फ़्फ़रनगर से मेरा सटीक परिचय अखबारों की सुर्खियों और मीडिया पर चिल्लाते नेताओं और ऐंकर्स से नहीं हुआ। इनमें से ज़्यादातर ने मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों को हिंसा की एक घटना की तरह पेश किया, जो कि यह थी, पर बस वहीं रुक गए। हिंसा की परतों को हटाकर देखते तो हिंसा की जड़ें कहीं गहरी और भीतर तक धंसी हुई नज़र आतीं।
मुज़्ज़फ़रनगर से मेरा सही परिचय हुआ प्रख्यात लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा “जूठन” के माध्यम से। एक शहर के साथ ही यह एक समाज, एक व्यवस्था और एक मानसिकता का भी परिचय है। पर ओमप्रकाश के लिए यह आत्मकथा लिखना कोई खूबसूरत यादों का सफर नही रहा।