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June Summary

A recap of June posts:

-अमिता चतुर्वेदी 
प्रस्तावना : प्रस्तुत लेख अज्ञेय के उपन्यास 'अपने अपने अजनबी' के मूल्यांकन द्वारा हिन्दी साहित्य में वैयक्तिक यथार्थबोध के सिद्धांत की यथार्थवाद के परिपेक्ष्य में संभावनाएं खोजने का प्रयास करता है।  





-Sumit Chaturvedi
Preview: A building stands amidst swanky new showrooms, housing big brand retail stores in the Sadar Market of Agra, the decades old street market- a colonial legacy much like in many other erstwhile British administrated cities and towns of India. The building, a shop, painted in white with its name painted in big bold letters in red stands unchanged for as long as one can remember in an otherwise constantly changing market street which keeps getting makeovers, new outlets and novelty stores. Established in 1946 before a year of Indian independence, its name is as symbolic as it could get- Modern Book Depot. 


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उच्च माध्यमिक स्तर पर सामाजिक पाठ्य विषय: महत्व और वस्तुस्थिति।

प्रस्तावना: हिन्दुस्तान के कई शहरों में उच्च माध्यमिक स्तर पर सामाजिक पाठ्य विषयों का विकल्प छात्र-छात्राओं के लिए मौजूद नही है। पर इस स्थिति पर एक समग्र विश्लेषणात्मक शोध की भारी कमी है।विज्ञान, वाणिज्य, कला या अन्य विषय समूह से चुने गए विषय ही निर्धारित करते हैं कि विद्यार्थी आगे जा कर किस क्षेत्र में काम करेगा पर साथ ही यह भी कि उसका सामाजिक और राजनैतिक दृष्टिकोण क्या होगा। इसलिए सामाजिक पाठ्यक्रम को मिलने वाली चुनौतियों के मद्देनज़र उच्च माध्यमिक स्तर पर ध्यान देना अति आवश्यक है।

Ranglok Theatre Festival: Putting Agra On The Indian Theatre Map

Monsoon perhaps inspires more art than any other season; especially performance art. So, what could be better than a festival of theatre to be held right in the midst of this season. Ranglok Sanskritik Sansthan, one of the most prominent theatre groups in the city of Agra, is bringing a four-day theatre festival to the iconic Sursadan auditorium in Agra this month. To be held from 22nd of July till 25th of July, Ranglok Theatre Festival will feature four plays.

हिन्दी एक्शन-फंतासी कॉमिक उपसंस्कृति की यात्रा- इंद्रजाल से लेकर राज कॉमिक्स तक

एक्शन और फंतासी का मिलन एक बेहद शक्तिशाली सांस्कृतिक गठजोड़ है। और अक्सर यह सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण गठजोड़ उपभोक्तावाद के लिए भी बहुमूल्य हो जाता है। हैरी पॉर्टर की उपन्यास श्रंखला के लिए पूरे विश्व में दीवानगी को देख लीजिए या फिर अमेरिका की कॉमिक बुक इंडस्ट्री की आपार सफलता को ही, एक्शन और फंतासी की ताकत का अंदाज़ा आपको लग जाएगा। इस गठजोड़ से हमेशा एक उपसंस्कृति का जन्म होता है जिससे उपजे संसार या फिर बहु-संसारों में बच्चे और युवा रोमांच और आनंद तलाशते हैं।
क्योंकि यह उपसंस्कृति भाषा से निर्मित होती है, इसलिए अलग-अलग भाषाएँ और उनका सामाजिक संदर्भ इन उपसंस्कृतियों का स्वरूप निर्धारित करते हैं। हिन्दी भाषा में आधुनिक समय में पहला एक्शन और फंतासी का गठजोड़, हिन्दी साहित्य के पहले उपन्यासों में से एक, देवकी नंदन खतरी द्वारा रचित ‘चंद्रकांता’ में देखा जा सकता है। तिलिस्म और एक्शन से भरपूर इस उपन्यास में कई ऐसे तत्व थे जिन्होंने इस रचनावली को उस समय में ही नहीं, बल्कि आगे के समय में भी लोगों के लिए रोचक और आकर्षक बनाए रखा।
हिन्दी कॉमिक बुक्स का संसार कभी बहुत समृद्ध या वृहद नहीं रहा, पर एक…