Skip to main content

Posts

Showing posts from February, 2015

अभिव्यक्ति में संभावनाएँ: 'रंगलोक' समूह द्वारा 'जाति ही पूछो साधू की' नाटक का मंचन।

प्रस्तावना: किसी भी सामाजिक आलोचना में बहुत सम्भावनाएँ  छुपी होती हैं।  कला के माध्यम से की गई सामाजिक आलोचना और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह व्यापक रूप से समाज में कई सन्देश पहुंचाती है।  20 फरवरी 2015, को सूरसदन ऑडिटोरियम में  रंगलोक सांस्कृतिक संस्थान द्वारा "जाती ही पूछो साधू की" का ताज महोत्सव के अंतर्गत सफल मंचन ऐसी ही कला प्रस्तुति का एक उदाहरण था।  नाट्य कला का कोई गहरा ज्ञान होने का दावा किए बिना इस नाटक की एक समीक्षा प्रस्तुत करने की ज़ुर्रत इस लेख में की गई है पर साथ ही कलात्मक अभिव्यक्ति के सामाजिक दायित्व पर कुछ ईमानदार टिप्पणी भी इसमें शामिल हैं।

Costs of Cleanliness.

Abstract: The following is an eyewitness account, and the musings that follow, of two little girls sweeping the roof of a primary school in Agra named B.S. Public Primary School located at Shamshabad Road. (Note: This is a citizen's account with some questions that need to be asked.)