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पोंडीचेरी को समझने की एक नाकाम कोशिश।

पोंडीचेरी या पुडुचेरी के बोलिवार्ड के नक्शे को देखेंगे तो पाएंगे कि लम्बी लम्बी लकीरों से कई सारी छोटी छोटी लकीरें मिलती हैं और हर छोटी लकीर आगे जाकर बंगाल की खाड़ी के किनारे चलने वाली गोर्बे एवेन्यू में जाकर मिल जाती है और कुछ इस तरह सड़कों का एक बहुत ही महीन पर बहुत ही सुलझा हुआ जाल बन जाता है। कुछ ऐसी ही फितरत है यहाँ की औपचारिक और अनौपचारिक संस्कृति की भी। सरकारी इमारतें, सड़कें, स्ट्रीट, कैफ़े, चर्च, बुत आदि को देखकर लगेगा कि कई सारी सभ्यताएँ और उनसे उपजी पहचानें एक दूसरे से विभिन्न मौकों पर मिल रही हैं और एक साझा संस्कृति का जाल बुन रही हैं।  
खास बात यह है कि जहाँ सारा देश (गोवा को छोड़कर) अपने आप को अंग्रेजी उपनिवेश से जूझता हुआ पाता है, पोंडी के लिए उपनिवेशी सत्ता का अर्थ था फ्रांसिसी राज्य। यह बात हमने किताबों में पढ़ी होगी पर अकसर भारत के अंग्रेज़ी या ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध हुए संघर्ष के वृतान्त में हम पोंडी और गोवा जैसे अपवादों को नज़रंदाज़ कर देते हैं। पोंडी तमिल और फ्रेंच भाषा-सभ्यता के संगम से बना है। और जैसा कि इस देश में अकसर होता है, अंग्रेज़ी यहाँ भी एक साझा माध्यम है, हालांकि साझा संस्कृति नही।
हम सभी जानते हैं कि भारत के अनेक शहरों पर अंग्रेज़ी हुकूमत बुलन्द रही है। इसकी अमिट पहचान आज भी हमें सड़कों के नाम, औपचारिक व्यवस्था और हज़ारों इमारतों के रूप में दिखाई दे जाती है। आगरा में बड़े होते हुए और दिल्ली में स्कूल के बाद की पढ़ाई करते हुए इन दोनों शहरों पर मुग़ल, अंग्रेज़ी और उससे पहले हो चुकी कितनी ही हुकूमतों की छाप को देखा है। अंग्रेज़ी इमारतों में आज भी भारत और राज्य सरकारों के दफ्तर ज़िन्दा हैं और सड़कें या उन से जुड़ी गलियों पर आज भी किसी अंग्रेज़ी अफसर की पहचान दिख जाती है। वो बात अलग है कि आगरा में एक सड़क का नाम जो किसी Tucker के नाम पर पड़ा होगा आज टक्कर रोड के नाम से जानी जाती है पर फिर जब तक यह सड़क अपने नाम को सार्थक ना करे तब तक सब ठीक है।

पर पोंडी इस मामले में इन शहरों से अलग है। फ़्रांसिसी संस्कृति की पहचान पर यहाँ आज भी धूल इकट्ठा नही हुई लगती है। गोर्बे एवेन्यू के एक छोर पर और समंदर के दूसरे छोर पर खड़ी डू प्लेक्सीस की भव्य मूर्ति इसकी मिसाल है। हाथ में एक दस्तावेज लिए हुए डू प्लेक्सिस के पैरों के पीछे बोरियों का गट्ठर रखा हुआ है जिसके कुछ नीचे लगे एक पत्थर पर फ़्रेंच में कुछ लिखा है। थोड़ी छानबीन की तो पता चला कि असल में यह मूर्ति उन्नीसवीं सदी में लगाई गई थी पर 1979 में इसे इसकी पुरानी जगह से हटा कर यहाँ लगा दिया गया था। इसके पीछे क्या वजह थी यह नही मालूम पर पत्थर पर मौजूद इस इबारत को 1982 में फ्रेंच भाषा में ही लिखा गया है। ऐसे ही 2002 में उद्घाटित हुई एक सरकारी इमारत का नाम भी हिन्दी, अंग्रेज़ी और फ़्रेंच भाषा में लिखा हुआ है।                                                                                   
सड़कों और गलियों में निकल जाएँ और जानना हो कि हम कहाँ खड़े हैं तो यह जान लीजिए कि फ़्रेंच में स्ट्रीट को Rue शब्द से जाना जाता है। कहीं यह मत सोचियेगा कि यहाँ भला हर गली का नाम एक ही इन्सान के नाम पर क्यों पड़ा है (पर मुझे मालूम है कि आप मुझसे कहीं ज्यादा समझदार हैं और ऐसी नासमझी नही करेंगे)।                                   इन गलियों में हालांकि जिस गली ने मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित किया वह थी Petit Canal Street जिसका सीधा सीधा अनुवाद है पतली नाली की गली। अकसर जब हम सड़कों या मुहल्लों के अजीबोगरीब नाम सुनते हैं तो ऐतिहासिक तर्क लगाते हैं कि इस कारण या उस कारण यह नाम पड़ा होगा। पर यहाँ सबूत सामने हाज़िर है। एक पतली सी लकीर की तरह बहने वाली नाली एक चौंड़ी सी गली के बीचोंबीच बहती है। हाँ यह ज़रूर है कि यह संरचना क्यों की गई इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है।
प्रख्यात इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम ने राष्ट्रीयता के बारे में लिखा था कि इसे रिवाज़ों के आविष्कार से गढ़ा जाता है। यानि राष्ट्रीयता की पहचान हमें राष्ट्र के नाम पर बनाए गए कुछ रिवाज़ और चिन्ह आदि के माध्यम से होती है। इस प्रक्रिया में अकसर लोक कथाओं और ऐतिहासिक रूप से प्रचलित कहानियों के नायक नायिकाओं को मुर्ति, तस्वीर आदि के द्वारा राष्ट्रीय नायक/नायिका बना दिया जाता है। फ़्रेच इतिहास में एक ऐसी नायिका थी जोन ऑफ़ आर्क। अगर डू प्लेक्सीस की मूर्ति काफी ना हो फ़्रेच पहचान को स्थापित करने के लिए यहाँ एक विशाल बगीचे में आपको जोन की मूर्ति भी मिल जाएगी जो एक अत्यंत धार्मिक महिला थीं और शायद इसीलिए यह मूर्ति एक चर्च की तरफ मुँह कर खड़ी हुई है।

अभी तक के ब्यौरे से आपको लग सकता है कि मैं यहाँ पर फ़्रेंच उपनिवेश की छूटी पहचान को साबित करने में लगा हूँ। पर खास बात यह है कि यह एक अजीब शहर है जो जितना फ़्रेंच है उतना ही हिंदुस्तानी भी (और यहाँ मेरा मतलब हिन्दी, हिन्दु, हिन्दुस्तान वाले जुमले से नही है)। 15 अगस्त के दिन यहाँ पहुँचिए और आप आश्चर्यचकित रह जाएँगे। कम से कम मैंने तो ऐसा जोशो खरोश आज के समय में उत्तर भारत के किसी शहर में स्वतंत्रता दिवस के लिए नही देखा है। शाम होते ही शहर के कई कोने नारंगी, सफेद और हरे रंग से जगमगाने लगे। पार्क, सरकारी इमारतें, लेफ्टिनेंट जनरल का घर और ना जाने कितने अन्य स्मारक आज़ादी के जश्न में सरोबर थे।

गाँधी की मूर्ति पर लटकती हुई अनगिनत बिजली की झालरें किसी शादी में दूल्हे के सहरे की याद दिला रही थीं। अफसोस कि सादगी से किसी को याद नही किया जा सकता फिर चाहे याद किया जाने वाला खुद ही कितना सादगी पसंद क्यों न हो।                                                                                                     
हाँ आपको लग सकता है कि आज़ादी के दिन चंद जगहों को सजाने से क्या साबित होता है। ऐसा तो कई जगह होता होगा। पर खास बात यह भी है कि गाँधी ही नही इस शहर ने भारतीय राष्ट्रीयता की पहचान को ज़िंदा रखने के लिए कई और भारतीय नायकों (नायिकाएँ नही) की स्मृति को संजोया है। हॉब्स्वॉन की थ्योरी की मिसालें आपको नेहरू की मूर्ति और सड़कों के नाम जैसे महात्मा गाँधी रोड, जवाहरलाल नेहरू स्ट्रीट और लाल बहादुर शास्त्री मार्ग आदि के रूप में मिल जाएंगी। पर फिर इन महानुभावों के नाम की सड़कें तो कई जगह होती हैं। और सरकारी इमारतों को आज़ादी की वर्षगांठ पर सजाना तो पुरानी परंपरा है।
इस उलझन को सुलझाने के लिए काम आ सकता है आम लोगों के जीवन और संस्कृति से रूबरू होना। इत्तेफ़ाक से मुझे आज़ादी के जश्न और आम लोगों के इसमें शिरकत की एक झलक मिल सकी। वैसे तो एक लंबा सप्ताहांत होने के कारण यहां सैलानियों का हुजूम लगा हुआ था, पर शहर के कई मुकामों पर यहां की विशिष्ट परंपराओं से मुखातिब होने का मौका भी मिला। शाम होते ही गोर्बे एवेन्यू जगमगाने लगा और यह सोचते सोचते कि अब शाम को क्या किया जाए, अचानक एक कोने से मुझे बड़े से स्पीकर पर क्लासिकल म्यूज़िक सुनाई पड़ने लगा। देखा तो यहाँ पोंडीचेर्री के किसी सरकारी विभाग द्वारा कोई म्यूज़िकल कार्यक्रम आयोजित किया गया था। वीणा और तबले पर संगीतज्ञ संगत दे रहे थे और बहुत तेज़ आवाज में बज रहे स्पीकर पर लगभग फटती हुई ध्वनि में श्रोता संगीत का आनन्द ले रहे थे।
    कुछ देर मैंने भी सुना, पर फिर आगे बढ़ गया तो अचानक चलते चलते एक फोटो प्रदर्शनी के सामने आ गया।शहर के ही लोगों की दी गई तस्वीरों से बनी इस प्रदर्शनी को देखकर लगा कि लोग इसे हल्के में नही लेते। अपने अपने नज़रिये से अपने समाज को देखने वाले प्रतिभागियों की नज़र से शहर को कुछ और समझने में मदद मिली। प्रदर्शनी के दूसरे छोर पर पार्क और लेफ्टिनेंट जनरल के घर बेहद तेज़ रौशनी में जगमगा रहे थे। पूरे शहर में एक अजीब सा उन्माद था। मैं इसका दावा नही करता कि कुछ कदम पैदल चलकर मैंने पूरे शहर और उसकी संस्कृति को समझ लिया। पर अगली सुबह जब समंदर के किनारे बैठकर मैं लहरों को देख रहा था और बहुद देर बैठे रहने के बाद जब मैं पीछे मुड़ा तो सुबह सुबह खाली पड़ी सड़क की तस्वीर मेरे पीठ पीछे बदल चुकी थी।


सड़क के किनारे किनारे जाने कितने ही चौकोर खाने चौक से खींचे जा चुके थे और उनमें कई महिलाएँ रंगोलियाँ बना रही थीं। जिज्ञासावश जब एक महिला से पूछा कि यह किस खुशी में हो रहा था, तो उन्होंने बताया कि आज पोंडी का आज़ादी का दिन है। 16 अगस्त को पोंडी फ़्रेंच सत्ता से आज़ाद हुआ था। जहाँ मुझे लग रहा था कि पोंडी भारत की आज़ादी पर ही इतना उन्मादी हो जाता है, सुबह सुबह इस तरह का उत्साह देखकर मुझे यहाँ के लोगों के बारे में एक और सबक मिला।
पोंडी को समझने की कोशिश में पहले मुझे इस शहर पर छूटी फ़्रेंच सभ्यता की अमिट छाप दिखाई दी, कुछ समय और बिताया तो देखा कि यहाँ लोग भारत की आज़ादी को किस जोशो खरोश से मनाते हैं और एक पूरा दिन बिता लिया तब पता चला कि यहाँ के लोगों के लिए अपना आज़ादी का दिन भी कितना खास है। पर फिर भी अपनी बहुतेरी पहचानों के जाल से बुना यह शहर बाकी भारत से कुछ अलग कुछ आज़ाद सा लगा, जहाँ लड़के लड़कियाँ आराम से अपनी साइकिलों पर शहर की छोटी बड़ी गलियों में घूमते हुए दिखते हैं, फ़्रेंच कैफ़े और पूरी-सब्ज़ी की दुकानें हर कुछ दूरी पर मिल जाती हैं और कई नस्लों के लोग सुबह शाम समंदर के किनारे टहलते हुए या जॉगिंग करते हुए दिखाई पड़ जाते हैं।


पर यहाँ मैं पोंडी को लेकर कोई ख्याली खूबसूरत दुनिया नही बुनना चाहता क्योंकि इतने करीब से तो इस शहर को देखा भी नही। हाँ यह ज़रूर है कि चौबीस घंटे के समय में चाह के भी मैं पोंडी की पहचान को लेकर एक निश्चित धारणा नही बना सका। यह एहसास हुआ कि शायद राष्ट्र को एक कल्पना मानने वाले भी इस थ्योरी को सच साबित करने में कुछ जगहों पर किसी ना किसी राष्ट्रवाद की पहचान चस्पा करने में उतने ही मशगूल हो जाते हैं जितने कि राष्ट्रवाद के कट्टरपंथी समर्थक। लोग अलग अलग वजहों से अपने शहरों की अलग अलग तस्वीर बनाने में चाहे-अनचाहे योगदान करते जाते हैं और राष्ट्र को लेकर चल रहे वाद विवाद में, विरोध और समर्थन, दोनों ही खेमे वाले उनमें अपनी अपनी वजह तलाशते रहते हैं। पर जैसा कि किसी ने लिखा है “सितारों से आगे जहां और भी हैं…”।  

- सुमित चतुर्वेदी 

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