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Showing posts from September, 2013

धारावाहिक ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ (1988): यथार्थ, यथार्थवाद और संवेदना के बीच तालमेल ।

-सुमितचतुर्वेदी
भारतीय टेलिविज़न के मौजूदा स्वरूप को देखकर यह अंदाज़ा नही लगाया जा सकता है कि कभी धारावाहिकों और टीवी की दुनिया नाटकीयता (melodrama) और अतिश्योक्तिपूर्ण कथानक से अलग भी कुछ रही होगी। अस्सी के दशक के मध्य से नब्बे के दशक के आरम्भ तक भारतीय टेलिविज़न का एक ऐसा प्रयोगात्मक दौर चला था, जिसमें यथार्थवादी सिनेमा और साथ ही मुख्यधारा सिनेमा के दिग्गज निर्माता निर्देशकों ने टी वी के लिए अनेक कार्यक्रम बनाए थे। इन कार्यक्रमों में बायोपिक (किसी व्यक्ति की जीवनी पर आधारित धारावाहिक अथवा टेलीफ़िल्म), साहित्यिक रूपान्तरण और अनेक विषयों पर टेलीफ़िल्म आदि शामिल थे। इन सभी कार्यक्रमों की खास बात थी कि कथानक या फ़िर विषय वस्तु में, या फ़िर दोनों में ही ये यथार्थवाद से प्रेरित रहते थे। 1988 में मिर्ज़ा ग़ालिब के जीवन पर आधारित बना ग़ुलज़ार का सत्रह भागीय धारावाहिक भी इस प्रयोगात्मक दौर का ही एक अंग था जिसे आज भी अपने कलात्मक परन्तु यथार्थपूर्ण चित्रण के लिए जाना जाता है।