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कहानी ‘धारावाहिकों’ की।


कहानी ‘धारावाहिकों’ की।

द्वारा: सुमित चतुर्वेदी

प्रस्तावना: धारावाहिक दूरसंचार का एक महत्वपूर्ण और संभावनाओं से भरा माध्यम है पर एक गहन शोध और विचार के बिना यह एक सामाजिक रूप से अपरिपक्व और बौद्धिक रुप से बौना माध्यम बन कर रह सकता है। यह लेख टीवी धारावाहिक के लगभग तीन दशक लम्बे इतिहास की सरंचनात्मक समीक्षा का प्रयास करता है जिससे भारत में धारावाहिकों के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभावों का स्पष्ट चित्रण किया जा सके।

धारावाहिक को भारत में आए हुए तीस साल होने वाले हैं। 1984 में भारत का पहला धारावाहिक हम लोगदूरदर्शन पर प्रसारित हुआ था और टेलिविजन (टीवी) की दुनिया रातों रात बदल गई। तब से लेकर अब तक टीवी में बहुत कुछ बदल गया और खास तौर पर धारावाहिक एक कार्यक्रम शैली से बढ़कर एक उद्योग में तब्दील हो गया। पर खेदजनक बात यह है कि इतने महत्वपूर्ण परिवर्तनों के बावजूद टीवी और खास कर धारावाहिकों द्वारा निभाई जाने वाली आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भूमिकाओं पर गहन शोध बहुत कम किया गया है।
अत: इस लेख में यह कोशिश की गई है कि एक संरचनात्मक ढंग से भारत में धारावाहिकों द्वारा तय किए गए सफ़र की कहानी को प्रस्तुत किया जाए। क्योंकि धारावाहिक एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम है जिसमें जन संचार की अनगिनत संभावनाएँ छिपी हुई हैं पर यदि इसे गैर-संजीदा तरीके से लिया जाए तो यह एक सामाजिक रूप से अपरिपक्व और बौद्धिक रुप से बौना माध्यम बन कर रह सकता है। 

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हम लोगका भारत में आना एक बदलते अर्थशास्त्रीय एवं राजनैतिक परिवेश के दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है। 80 का दशक सारे विश्व में टीवी उद्योग में बढ़ते उदारीकरण और निजीकरण का दौर था। ये परिवर्तन दो माध्यम से परिलक्षित हो रहे थे, विज्ञापनों के स्त्रोत एवं कार्यक्रमों के निर्माण शैली में।
हम लोग का निर्माण कार्य मनोहर श्याम जोशी, पी कुमार वासुदेव, सतीश गर्ग और शोभा डॉक्टर के चार सदस्यीय समूह को सौंपा गया, जिसके लिए एक स्वायत्त निजी कंपनी, ‘टाइम ऐण्ड विडियो स्पेस कॉर्पोरेशनस्थापित की गई। इस प्रकार आरम्भ से ही धारावाहिकों का निर्माण कार्य निजी कंपनियों के हिस्से आया। पर सरकार द्वारा निजी समूहों को रेडियो, टीवी आदि के लिए कार्यक्रम बनाने के लिए कार्यभार आवंटन कि प्रथा हमेशा से चली आ रही है। इसका मतलब यह नही निकाला जा सकता कि निजीकरण किसी सरकारी संस्था पर हावी हो गया हो। हालांकि इसे आने वाले समय में धारावाहिक उद्योग में बढ़ने वाले निजीकरण की शुरुआत की तरह ज़रूर देखा जा सकता है।
इंदिरा गाँधी की राजनैतिक विचारधारा में परिवर्तन आने के साथ ही निजीकरण अब भारत में एक बहुत बड़ा हऊआ नही रह गया था। और निजीकरण की आहट सबसे पहले जिन संस्थाओं में सुनाई पड़ी, डीडी उनमें से एक था। इसका दूसरा और अधिक स्पष्ट उदाहरण था, डीडी में विज्ञापनकर्ताओं का बढ़ता आकर्षण। जहाँ धारावाहिक टीवी पर दर्शकों को, पहले कभी नही देखे गए उत्साह से, खींचने में सफ़ल रहा था, वहीं इससे मुनाफ़ा कमाने का फ़ॉर्मूला विज्ञापन उद्योग को डीडी के दरवाज़े पर ले आया था।
देश में पहले कभी धारावाहिक ना बने होने के कारण, ‘हम लोगका टीवी पर आना एक अहम सामाजिक घटना थी, जिसके लिए पहले राजनीतिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि बनाना आवश्यक था। भले ही राजनैतिक नीति में बदलाव आने शुरू हो गये हों पर प्रत्यक्ष रूप से अभी भी इंदिरा सरकार पिछले दशकों से औपचारिक रूप से चली आ रही समाजवादी विचारधारा से अलग नही हुई थी। इसलिएहम लोगको भारत में सामाजिक विकास के संदेश के वाहन के रूप में उतारा गया। ऐसा दूसरे देशों के धारावाहिकों के अनुभव का अनुसरण करके किया गया था।
इससे पहले 1969 में पेरु मेंसिम्प्लेमेन्टे मरियाऔर 1975 में मेक्सिको मेंवेन कोनमिगोनामक धारावाहिक सामाजिक विकास के नाम पर शुरू किए गए थे। खासकर पेरुवियन धारावाहिक में एक ऐसी लड़की की कहानी दिखाई गई थी जिसनेसिंगरकंपनी की सिलाई मशीन का उपयोग कर अपनी गरीबी की परिस्थिति से आज़ादी पाई थी। इस प्रकार इस धारावाहिक में अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने का सन्देश देने के साथ हीसिंगरमशीनों का भरपूर विज्ञापन किया गया जो बहुत प्रभावशाली भी रहा। इस धारावाहिक के चलतेसिंगरकी सिलाई मशीनों का कारोबार बहुत बढ़ा।
हालांकिहम लोगने इस उदाहरण से आंशिक प्रेरणा ही ली। जहाँ इस कार्यक्रम की शुरूआत सामाजिक विकास के नाम पर ही की गई और धारावाहिक की कहानी भी एक मध्यमवर्गीय परिवार के दैनिक जीवन पर आधारित की गई थी, वहीं इसके मुख्य प्रायोजक नेस्टले- दो मिनट मैगी नूडल्सका इसकी पृष्ठभूमि से दूर दूर तक कोई लेना देना नही था। बल्कि धारावाहिक की पहचान से उलट यह उत्पाद आधुनिक उपभोक्तावाद का प्रतीक था। हालांकि ऐसा होते हुए भीमैगीकाहम लोगके साथ जुड़ना अत्यंत सफ़ल रहा और आने वाले दशकों तक इस उत्पाद को टक्कर देना दूसरी कंपनियों के लिए आसान नही रहा।
हम लोगकी सफ़लता नए आयाम छू रही थी। कम से कम उत्तर भारत में तो बड़की, छुटकी, अश्विन और भागवंती आदि किरदारों से दर्शकों का एक गहरा रिश्ता बना चुका था। और जहाँ दूसरी तरफ़ टीवी की पहुँच भारत में 1984 में 28 प्रतिशत से बढ़कर 1985 के अंत तक 53 प्रतिशत हो चुकी थी, विज्ञापनकर्ताओं के लिए अब धारावाहिकों के माध्यम से अपने उत्पाद बेचने के लिए पर्याप्त वजह थी। यहाँ तक की 1987 तक टीवी पर विज्ञापन के लिए समय खरीदने की होड़ बेहद बढ़ गई थी। टीवी विशेषज्ञों के अनुसार डीडी इस समय तक सरकारी कोष पर आश्रित होने के बजाय उसका पोषक बनने की स्थिति में आ चुका था। और इस प्रकार मुनाफ़े को प्राथमिकता देने का निजीकरण का मंत्र डीडी में अपनी जगह बना चुका था।
इस घटनाक्रम में दूसरी महत्वपूर्ण बात जिस पर गौर करना आवश्यक है, वह है टीवी कार्यक्रमों के अंतराल में खाली जगह का विज्ञापन दिखाने के लिए एक उपयुक्त माध्यम बनना। यह बात तब ज़्यादा काबिल--गौर हो जाती है जब हम सोचते हैं कि इससे पहले भारतीय विज्ञापनकर्ताओं के लिए यह माध्यम बिल्कुल भी मौजूद नही था। अखबारों और रेडियो पर ही आश्रित रहने वाले यह विज्ञापनकर्ता अब एक ऐसे माध्यम से रूबरू थे जिसकी प्रसिद्धि उत्थान पर थी। और इस प्रसिद्धि का मुख्य श्रेय जाता था धारावाहिकों की सफ़लता को। इस प्रकार टीवी अब एक उद्योग में तब्दील होता जा रहा था जिसमें मुनाफ़े की पर्याप्त संभावनाएं उभर के सामने आ रहीं थी।
1984 में धारावाहिकों के आने के बाद, जहाँ प्रिंट मीडिया के विज्ञापन मुनाफ़े में 1983 और 1986 के बीच करीब 33 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, वहीं टीवी का मुनाफ़ा 40 प्रतिशत तक पहुँच गया।हम लोगकी सफ़लता के परिणाम स्वरूप और भी धारावाहिकों का निर्माण शुरू हो गया। हालांकि डीडी के लिए नित नए विज्ञापनकर्ताओं को टीवी पर समय देना एक चुनौती बनता जा रहा था। एक विज्ञापनकर्ता ने उस समय में यहाँ तक कहा था कि डीडी विज्ञापनों के लिए जगह देने में किसी मार्केट संस्था के बजाय किसी राशन संस्था की तरह व्यवहार करता है।

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डीडी के विज्ञापनकर्ताओं की माँगें संतुष्ट ना कर पाने और धारावाहिकों के अंतराल में विज्ञापन की एक नई स्पेस के बनने के बीच ही, 90 के दशक की शुरुआत में नए निजी चैनलों और केबल सुविधाओं का भारत के टेलिविज़न पर आगमन हुआ। टीवी विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि निजी सेवाओं का यह प्रवेश अंतराष्ट्रीय सैटिलाइट सेवाओं के दबाव या फ़िर मध्यम वर्ग की मांगों के चलते नही हुआ था। बल्कि जैसा कि पहले ही कहा गया है, यह सेवाएं भारत के उदारीकरण और निजीकरण के प्रति बढ़ते उदारवादी व्यवहार का नतीजा थीं।
प्रदीप एन थौमस (मीडिया विशेषज्ञ) का कहना है कि प्रसारण के प्रति भारत की विभिन्न सरकारों का रवैया सदा से ही संरक्षणात्मक रहा है। यानि कि औपचारिक नीति यही रही है कि जब तक लोग दूसरे विकल्पों के लिए तैयार ना हों तब तक प्रसारण का दायित्व सरकार के सुपुर्द रहेगा। हालांकि नरसिम्हा राव की सरकार के समय में यह पूरी कोशिश की जा रही थी कि निजी क्षेत्र में ऐसे विकल्प भरपूर मात्राओं में उभर कर आएं। इन परिवर्तनों से लाभान्वित हो रहे विज्ञापनकर्ता, जो पहले से ही विज्ञापन स्पेस की कमी की शिकायत कर रहे थे, निजी क्षेत्र में बढ़ते चैनल और केबल सेवाओं से बेहद खुश थे।
ऐसे में 1992 में स्टार टीवी भारत में शुरू हुआ। स्टार टीवी के तब के मालिक, अंतराष्ट्रीय मीडिया मुग़ल, रुपर्ट मर्डौक्ख ने भारतीय टीवी बाज़ार का फ़ायदा उठाने के लिए, सुभाष चन्द्रा के एशिया टुडे में 49.9 प्रतिशत शेयर में निवेश किया। एशिया टुडे के एशिया सैट ट्रान्सपॉन्डर द्वारा स्टार और चन्द्रा के चैनल ज़ी का प्रसारण भारत में किया जाता था। दोनों चैनलों के मध्य हुए इस करार की एक शर्त यह थी कि स्टार भारत में ना तो किसी भारतीय हिन्दी कार्यक्रम का निर्माण और ना ही उसका प्रसारण कर सकेगा और सिर्फ़ अंग्रेज़ी प्रसारण पर ही केन्द्रित रहेगा। यह साफ़ था कि हिन्दी धारावाहिक एक बेहद लाभदायक कार्यक्रम शैली थी और ज़ी इस क्षेत्र में अपने लिए अधिक प्रतिद्वंदिता नही चाहता था।
हिन्दी धारावाहिकों की मांग, जैसी कि उम्मीद थी, लगातार बढ़ती जा रही थी और स्टार को फ़लस्वरूप नुकसान बढ़ रहा था। 1996 तक यह स्थिति और तीव्र होती गई और स्टार ने अपनी हिन्दी कार्यक्रम ना दिखा पाने की अक्षमता की, अंग्रेज़ी कार्यक्रमों को हिन्दी में डब कर, भरपाई करने की असफ़ल कोशिश भी की। 1997 में इस स्थिति ने विवाद का रूप ले लिया और मर्डौक्ख ने अपना शेयर घटा कर चार प्रतिशत कर लिया। 1999 में चन्द्रा ने स्टार का एशिया टुडे में सारा हिस्सा अख्तियार कर लिया और दोनों कंपनियों ने अपने रास्ते अलग कर लिये।
अब स्टार, ज़ी को हिन्दी कार्यक्रम के बाज़ार में खुली चुनौती देने के लिए अबाध्य था। इससे स्टार को अपनी ज़मीन तैयार करने में काफ़ी मदद मिली और स्टार और सोनी एन्टरटेनमेंट टीवी के दर्शक वर्ग को अगर जोड़कर देखें तो इसमें 1998 और 1999 के बीच चार प्रतिशत की बढ़त हुई।
इन निजी चैनलों और केबल सेवाओं के भारत में आने की कहानी का यदि एक जायज़ा लिया जाए तो कुछ खास बिन्दु उभरकर आते हैं। पहला तो यह कि डीडी का प्रसारण के क्षेत्र में एक छत्र साम्राज्य अब स्टार और ज़ी के आ जाने से खत्म हो चुका था। इसकी पृष्ठभूमि स्वयं सरकार ने उदारीकरण और निजीकरण की नींव भारतीय बाज़ार में रखकर तैयार की थी। दूसरी खास बात यह है कि स्टार और ज़ी के साथ आने से दोनों को ही भारतीय बाज़ार में स्थापित होने का पारस्परिक लाभ मिला। हालांकि ज़ी ने पहले से ही हिन्दी कार्यक्रम वर्ग पर अपना अधिकार मजबूत करना चाहा। यदि ‘हम लोग’ की सफ़लता और ज़ी की हिन्दी कार्यक्रमों को प्रसारित करने की तत्परता को एक साथ रखकर देखें तो समझ आता है कि टीवी उद्योग के लिए हिन्दी धारावाहिक नामक उत्पाद कितना आवश्यक हो गया था। तीसरा अहम पहलू है स्टार और ज़ी का कार्यक्रम प्रसारण के विषय पर आपस में भिड़ना। यह भिड़ंत कई मायनों में एक प्रतीक थी आने वाले समय में एक उभरते अबाध्य कॉरपोरेट स्पर्धा कल्चर की जिसमें मुनाफ़ा सर्वोपरि था और जिसे सरकार की तरफ़ से अनुशासित करने वाला कोई नही था। इसके परिणाम स्वरूप टीवी पर विशुद्ध मुनाफ़े के लिए बनाए जाने वाले कार्यक्रमों की सामग्री का स्तर शीघ्रता से गिरने भी लगा।
1990 के दशक में और उससे पहले भी टीवी के बाज़ारीकरण और उससे जुड़े सांस्कृतिक मुद्दों पर चर्चा गरम रही। जहाँ 90 के पहले प्रसारण से जुड़े मसलों के अध्ययन के लिए बनी लगभग सभी कमेटियाँ सरकार के प्रसारण पर गहरी पकड़ के बारे में चिंतित थीं, वहीं 90 के दशक में बनी कमेटियाँ निजीकरण के प्रभावों पर भी चर्चा में शामिल हो गईं थी। चन्दा कमेटी (1966), वर्गीज़ कमेटी (1978), जोशी वर्किंग ग्रुप (1985), प्रसार भारती ऐक्ट (1990), दामोदर कमेटी (1991) और वर्दान कमेटी (1991) कुछ प्रमुख कमेटियों में से थी। पर सरकार का रवैया इन सभी कमेटियों की विभिन्न सलाहों पर उदासीन ही रहा जो कि बहुत आश्चर्यजनक नही था, यह देखते हुए कि टीवी का बाज़ारीकरण और निजीकरण स्वयं सरकार की पहल पर ही शुरु हुआ था।
बहरहाल बाज़ारीकरण की बहस पर दो विपरीत खेमे बँटे हुए थे। जो इसके समर्थन में थे, उनका मानना था कि निजी सेवाओं के होने से टीवी कार्यक्रमों के निर्माण के लिए धन आसानी से मुहैया हो पाता था और टीवी निर्माण को एक स्थायित्व मिलता था। स्टार और ज़ी के शुरुआती संबंध के उदाहरण से यह भी दिखता था, कि इससे भारतीय चैनलों और केबल सेवाओं को बाहरी निवेश की मदद से अपने को स्थापित करने का मौका मिलता था। टीवी उद्योग उत्थान पर था और धीरे धीरे एक कॉर्पोरेट संस्थान का रूप ले रहा था। 90 के दशक में ही तमिल भाषा के सफ़लतम चैनल सन टीवी, तेलुगू में ईनाडु, मलयालम में एशियानेट और कन्नड़ में उदया चैनल ने सुभाष चन्द्रा द्वारा बनाई गई चैनल लॉबी- इंडियन ब्रॉडकास्टर्स असोसिएशन में सदस्यता ले ली।
जो टीवी उद्योग के व्यावसायिकीकरण से क्षुब्ध थे उनका मानना था कि यह परिवर्तन उपभोक्तावाद को बढ़ावा दे रहे थे जो कि आर्थिक रूप से कमज़ोर और हाशिए पर सिमटे सामाजिक वर्गों की उपेक्षा को बढ़ावा दे रहे थे।
इसे समझने के लिए ‘हम लोग’ के दौरान टीवी की दुनिया और दर्शक वर्ग में आए कुछ खास परिवर्तनों को समझना आवश्यक है। ‘हम लोग’ के शुरू होने से पहले 1983 में भारत के द्वारा इनसैट 1बी का प्रक्षेपण किया गया था जिससे टीवी की पहुँच काफ़ी हद तक गाँव, कस्बे और दूर दराज़ के इलाकों तक बढ़ गई थी। 1984 की शुरुआत में देश में 42 टीवी ट्रांसमीटर थे और 1985 के अंत तक यह संख्या 175 तक पहुँच गई थी। फ़लस्वरूप टीवी दर्शकों की संख्या भी 1984 और 1987 के बीच तीन करोड़ से आठ करोड़ तक पहुँच गई थी। पर खास बात यह थी कि क्योंकि इस समय सिर्फ़ डीडी ही प्रसारण सेवा दे रहा था, दर्शकों में सभी वर्ग और समुदाय के लोग शामिल थे।
जब निजी सेवाओं का टीवी पर आगमन हुआ, तो ये सिर्फ़ केबल सेवाओं द्वारा ही उपलब्ध थीं और पूरी तरह से मुनाफ़ा कमाने के लिए समर्पित थीं। क्योंकि केबल सेवाएं सस्ती नही थीं और इनका फ़ैलाव देश के सभी हिस्सों में बहुत तेज़ी से नही हुआ था, इसलिए ये चैनल सभी दर्शकों को आसानी से उपलब्ध नहीं थे। इस प्रकार यह निजी सेवाएँ मुख्यत: मध्यम और उच्च वर्गीय दर्शकों तक सीमित रहीं।
इसकी एक बड़ी वजह थी कि चैनलों पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों की कथावस्तु पर गौर करने के लिए कोई आधिकारिक सरकारी या गैर सरकारी संस्था उपस्थित नही थी, जो यह सुनिश्चित करे कि धारावाहिकों के विषय और उनकी कहानी पूरे समाज के लिए प्रासंगिक हों ना कि एक विशेष वर्ग या समुदाय के लिए। और क्योंकि निजी चैनलों का दर्शक वर्ग प्राय: उच्च या मध्यम वर्ग का था, इसलिए निम्न वर्ग या अल्पसंख्यक समुदायों की विषयवस्तु इन कार्यक्रमों से जाती रही।
दूसरी तरफ़ यह मध्यम वर्ग वह था जिस को उदारवादी आर्थिक नीति के कारण अपना व्यय बढ़ाकर भारत की आर्थिक व्यवस्था को संभालने के लिए निरंतर उत्साहित किया जा रहा था। असमान आर्थिक हालात के होते हुए, बाज़ार और फ़लस्वरूप सारी व्यवस्था अब मध्यम वर्ग की ही बाट जोह रही थी। उपभोक्तावाद एक सम्पूर्ण देश की विचारधारा बनती जा रही थी जिसका सीधा असर टीवी व्यापार पर भी पड़ रहा था।
अब जो ये कार्यक्रम पहले ही मध्यम वर्ग की कहानियाँ सुना रहे थे, तो इनके अंतराल में स्थापित विज्ञापन स्पेस भी इस वर्ग को सीधे आकर्षित करने के लिए उपयुक्त माध्यम बनती जा रही थी। ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन राशि इन चैनलों की झोली में जा रही थी और डीडी को इनके मुकाबले नुकसान उठाना पड़ रहा था। डीडी के सभी वर्गों के लिए बनाए जा रहे कार्यक्रमों को मध्यम वर्ग नकार रहा था। इसका प्रमाण यह था कि जब स्टार ने अपने चैनल स्टार प्लस को हिन्दी में रूपान्तरित किया तो शुरुआत में डीडी के संग्रह से पुराने कार्यक्रमों को, अपना कर, दिखाना शुरू किया, तब यह प्रणाली बिल्कुल नही चली। इस प्रकार अब सभी चैनलों के लिए मुनाफ़ा कमाने का एक मात्र रास्ता था अपने कार्यक्रमों को ज़्यादा से ज़्यादा मध्यम वर्ग की विषय वस्तु से जोड़ना।
जहाँ पहले डीडी अपने विभिन्न कार्यक्रमों (जैसे ‘देख भाई देख’, ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’, ‘नीम का पेड़’ आदि) के द्वारा विभिन्न वर्गों और समुदायों की कहानी दिखलाता था वहीं अब सभी चैनल एक दूसरे की होड़ में वैश्विक भारतीय समाज, जिसमें प्रवासीय भारतीयों का अहम हिस्सा था, को लुभाने वाली कहानियों पर ध्यान देने लगे। ऐसा इसलिए था कि मध्यम और उच्च वर्गीय दर्शकों की अपनी अलग पहचान बनने के साथ ही एक संयुक्त अंतराष्ट्रीय पहचान भी बनती जा रही थी। स्टार और सोनी पहले ही अंतराष्ट्रीय समूह थे, ज़ी भी अपनी पहचान इस वैश्विक भारतीय समुदाय या डाइस्पोरा से जोड़ना चाहता है। ऐसे में डीडी को भी ऑस्ट्रेलिया के नाइन नेटवर्क को डीडी मेट्रो चैनल के लिए कार्यक्रम बनाने के लिए अनुबंधित करना पड़ा। हालांकि यह कदम बहुत सफ़ल ना हो सका और 2003 में डीडी मेट्रो को डीडी न्यूज़ में तब्दील कर दिया गया। 

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टीवी उद्योग के विकास में अगला महत्वपूर्ण अध्याय था टीवी प्रोडक्शन हाउस के द्वारा निभाई गई भुमिका का। 2000 तक ये प्रोडक्शन हाउस पर्दे के पीछे से अपना काम कर रहे थे। यानि कार्यक्रम बनाने में इनका बड़ा हाथ तो था पर इन पर टीवी विशेषज्ञों और टीवी व्यापार की चर्चा का खास ध्यान नही गया था।
हिन्दी फ़िल्मों में प्रोडक्शन हाउस हमेशा से शक्तिशाली रहे हैं। पहले निर्माण और अब विज्ञापन एवं वितरण में इनका प्रमुख रोल है। पर फ़िल्म और टीवी उद्योग में कुछ बुनियादी अंतर हैं। फ़िल्में निर्माता, निर्देशकों द्वारा बनाई जाती हैं, और दर्शकों तक सिनेमा हॉल द्वरा पहुँचाई जाती हैं। परन्तु टीवी के कार्यक्रम मीडीया हाउस द्वरा तैयार किए जाते हैं और चैनलों द्वरा टीवी के माध्यम से घरों तक पहुँचाए जाते हैं। फ़िल्मों की निर्माण राशि उनके दर्शकों तक पहुँचने से पहले ही जुटा ली जाती है, पर धारावाहिकों के लिए यह राशि निरंतर जमा की जाती है विज्ञापनों के माध्यम से। ऐसे में यह राशि जमा करने की ज़िम्मेदारी का निर्वाह चैनल करते हैं और इसलिए धारावाहिकों की विषयवस्तु पर जितना मीडिया हाउस का अधिकार होता है, उससे अधिक चैनलों का अधिकार हो जाता है।
कार्यक्रमों का चलते रहना उनका अच्छी टी आर पी जुटाने पर निर्भर रहता है क्योंकि उनके द्वारा बनाई गई विज्ञापन स्पेस का स्थायित्व इसी पर आधारित है। ऐसे में इस विज्ञापन स्पेस को दीर्घायु बनाने के लिए चैनलों को एक सफ़ल फ़ॉर्मुले की दरकार थी। अनिश्चितता के ऐसे माहौल में स्टार के लिए 2000 में बालाजी टेलीफ़िल्म्स एक ऐसा तुरुप का इक्का बना जिसने जिस पर हाथ रखा वही सोना बन गया। स्टार की बालाजी के साथ साझेदारी ने एक के बाद एक तीन सुपरहिट कार्यक्रम दिए। ‘क्योंकि सास भी कभी बहु थी’, ‘कहानी घर घर की’ और ‘कसौटी जिंदगी की’ ने प्रसिद्धि के नए आयाम बनाए और रातों रात स्टार, ज़ी और सोनी के साथ सीधी टक्कर में आ गया।
बालाजी टेलीफ़िल्म्स और स्टार की भागीदारी इतनी सफ़ल हुई कि 2004 में स्टार ने बालाजी में 21 प्रतिशत के शेयर खरीद लिए। इस घटनाक्रम ने प्रोडक्शन हाउस को टीवी उद्योग में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया।
पिछले कुछ सालों में कई धारावाहिकों ने 1000 ऐपिसोड पूरे करने का कीर्तिमान स्थापित किया है, वह भी तब जब कि दर्शक वर्ग किसी भी एक चैनल से लम्बे समय के लिए नही जुड़ रहे हैं। पिछले कुछ समय में ही कम से कम तीन चैनल (9X, इमैजिन और रीयल) कम टी आर पी की बलि चढ़ गए। और जहाँ 2000 से 2008 के बीच अच्छी टी आर पी की परिभाषा थी 14 से 15 प्वाइंट प्रति सप्ताह, वहीं आज के समय में तीन से चार प्वाइंट की रेटिंग भी अच्छी मानी जाती है।
1000 एपिसोड की इस संस्कृति की शुरुआत ‘क्योंकि…’ के द्वारा ही हुई। यह कार्यक्रम इतना सफ़ल हुआ कि धारावाहिकों की एक पूरी जमात का नाम ‘सास-बहु के सीरियल’ के नाम पर रख दिया गया। बालाजी इस प्रकार बेहद सफ़ल रहा और मीडिया हाउस अपने आप में एक औद्योगिक इकाई बन गया। हालांकि जब दशक के उत्तरार्ध में ‘क्योंकि…’ की टी आर पी गिरने लगी तो यह कार्यक्रम चैनल पर एक बोझ बनने लगा। मीडिया हाउस की ताकत की मिथ्या अब टूट चुकी थी और स्टार और बालाजी के बीच एक कड़वे फ़साद के बाद, जिसमें कानूनी पचड़े भी पड़ गए, इस धारावाहिक के साथ ही कुछ अन्य भी आनन फ़ानन में खत्म कर दिए गए।
इसके बाद टीवी मीडिया हाउस के ऊपर चैनल हावी होने लगे। कार्यक्रमों को चलाने के लिए सप्ताहांत में महा-ऐपिसोड की नई पद्धति शुरु की गई। इनमें किसी भी एक चैनल के अनेक कार्यक्रमों की कहानियों को आपस में जोड़कर एक लम्बे अवधि की कड़ी में विभिन्न किरदारों को एक साथ डाल दिया जाता है। यह पद्धति भले ही चैनलों के लिए लाभदायक हो पर, इतने लम्बे ऐपिसोड के बनाने का सीधा असर मीडिया हाउस और कलाकरों पर पड़ता है। धारावाहिकों की मूल कहानियों पर जो असर पड़ता है वह अलग है। स्टार प्लस के एक धारावाहिक ‘इस प्यार को क्या नाम दूँ’ के कलाकार बरुन सोबती ने इन महा-ऐपिसोड की प्रथा के कारण कलाकारों पर पड़ते अतिरिक्त बोझ के चलते इसे छोड़ दिया। उन्होंने इसके खिलाफ़ सीधे शिकायत करते हुए कहा कि यह प्रथा सीधे श्रमिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, क्योंकि जहाँ आम तौर पर किसी भी व्यक्ति को हफ़्ते में 45 घंटे ही काम करने की स्वतंत्रता है, वहीं टीवी कलाकारों को 84 घंटे तक काम करना पड़ जाता है।
इसका एक मुख्य कारण है कि कलाकारों को धारावाहिकों के साथ मुक्त करार के माध्यम से जोड़ा जाता है, ना कि एक नियमित पे-रोल पर। इसलिए ‘इंडस्ट्रीयल डिसप्यूट ऐक्ट’ इन पर लागू नही होता। कलाकारों की चैनलों के हाथों यह लाचारगी और बढ़ जाती यदि सिने और टीवी कलाकार संघ ने यह सुनिश्चित नही करवाया होता कि किसी भी कलाकार से एक दिन में बारह घंटे से ज़्यादा काम नही लिया जाएगा। बाज़ारीकरण के विरोधियों का मानना है कि प्रसारण के क्षेत्र में बढ़ते निजीकरण और उदारवाद ने चैनलों को अबाध्य ताकत दे दी है जिसके चलते वे अपनी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं।

(4)

पर हमारी रुचि केवल धारावाहिक के इतिहास में ही नही है, बल्कि उस इतिहास को बाँधने वाले तर्क में भी है। यानि वे क्या कारण हैं जो टीवी को दर्शकों और विज्ञापन बाज़ार के लिए इतना आकर्षक बनाते हैं?
बेनेडिक्ट ऐन्डरसन ने अठाहरवीं शताब्दी के पाश्चात्य समाज के लिए जो दर्जा उपन्यास व अखबार के आविष्कारों को दिया था, कई मायनों में वही दर्जा आज के युग में टीवी धारावाहिक के आविष्कार को दिया जा सकता है। ये धारावाहिक उपन्यास एवं अखबारों की कुछ खास खूबियों को अपने आप में सम्मलित कर लेते हैं और ऐन्डरसन के प्रिंट कैपिटलिज़्म के इलैक्ट्रॉनिक पर्याय के रूप में नज़र आते हैं। कैपिटलिज़्म यानि पूँजीवाद वस्तुओं के विशुद्ध मुनाफ़े के लिए थोक निर्माण की व्यवस्था पर आधारित है। जब धारावाहिकों को भी इसी तर्क पर बनाया जाने लगे तो उसे इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के पूँजीवाद की तरह देखा जा सकता है।
पर वह क्या खास खूबियाँ है जो धारावाहिक को उपन्यास और अखबार का सम्मिश्रण बनाकर उसे मुनाफ़ा कमाने का आसान साधन बानाते हैं? ऐन्डरसन का कहना है कि उपन्यास में विभिन्न पात्रों की एक ही काल में साथ साथ पर एक दूसरे से अनजान चल रही कहानियों की कल्पना इसे खास बनाती है। उसी प्रकार अखबार को प्रतिदिन पढ़कर एक पूरे समाज का सूचना के माध्यम से एक साथ जुड़ना उन्हें एक स्वकल्पित समूह यानि ‘इमैजिन्ड कम्युनिटी’ के रूप में बाँधता है। धारावाहिक में पात्रों की समकालीन चलती कहानियों की कल्पना का समकालीन उपभोग इसके दर्शकों को ऐसे ही स्वकल्पित समूह में बाँध देता है। ये समूह ऐन्डरसन के देश जितने बड़े नही हैं पर एक साथ ऐसे कई समूहों की कल्पना की जा सकती है जो अलग अलग धारावाहिकों की अलग अलग विषय वस्तुओं से अपने आप को जुड़ा पाते हैं। और शायद यही इन धारावाहिकों के चलने का मंत्र है।
इसमें पूँजीवाद अपने मौके इस प्रकार तलाशता है कि, उसे एक साथ अपना मनचाहा दर्शक वर्ग, यानि उपभोक्ता वर्ग एक समय पर अपनी अपनी टीवी स्क्रीन के सामने बैठा मिल जाता है और विज्ञापनकर्ता अपने उत्पाद का विज्ञापन सीधे लोगों के ड्रॉइंग रूम में कर पाते हैं। लेकिन पूँजीवाद की कार्य प्रणाली का पता लगा पाना ही काफ़ी नही है। यह समझना आवश्यक है कि वे क्या कारण हैं जो इन अलग थलग इनसानों को विभिन्न धारावाहिकों के माध्यम से जोड़ पा रहे हैं। और उससे भी ज़्यादा आवश्यक यह जानना है कि इस दर्शक समाज की कल्पना का हमारे सामाजिक और राजनैतिक यथार्थ पर क्या असर पड़ रहा है। दूसरे शब्दों में इस कलपना को समझने के लिए धारावाहिक को साधारण चश्मे से देखना छोड़कर, इसे एक ताकतवर दूरसंचार माध्यम के रूप में देखना आवश्यक है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह उपभोक्तावाद और पूँजीवाद के लिए मुनाफ़ा कमाने का माध्यम बन कर ना रह जाए जिससे अल्पसंख्यक और आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों की उपेक्षा हो।          
(लेख से जुड़े सभी सन्दर्भों की जानकारी के लिए opinion.tandoor@gmail.com पर संपर्क करें। आपकी प्रतिक्रया वांछनीय है। कृपया comments section में अपनी प्रतिक्रिया दें।) 

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Monsoon perhaps inspires more art than any other season; especially performance art. So, what could be better than a festival of theatre to be held right in the midst of this season. Ranglok Sanskritik Sansthan, one of the most prominent theatre groups in the city of Agra, is bringing a four-day theatre festival to the iconic Sursadan auditorium in Agra this month. To be held from 22nd of July till 25th of July, Ranglok Theatre Festival will feature four plays.

हिन्दी एक्शन-फंतासी कॉमिक उपसंस्कृति की यात्रा- इंद्रजाल से लेकर राज कॉमिक्स तक

एक्शन और फंतासी का मिलन एक बेहद शक्तिशाली सांस्कृतिक गठजोड़ है। और अक्सर यह सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण गठजोड़ उपभोक्तावाद के लिए भी बहुमूल्य हो जाता है। हैरी पॉर्टर की उपन्यास श्रंखला के लिए पूरे विश्व में दीवानगी को देख लीजिए या फिर अमेरिका की कॉमिक बुक इंडस्ट्री की आपार सफलता को ही, एक्शन और फंतासी की ताकत का अंदाज़ा आपको लग जाएगा। इस गठजोड़ से हमेशा एक उपसंस्कृति का जन्म होता है जिससे उपजे संसार या फिर बहु-संसारों में बच्चे और युवा रोमांच और आनंद तलाशते हैं।
क्योंकि यह उपसंस्कृति भाषा से निर्मित होती है, इसलिए अलग-अलग भाषाएँ और उनका सामाजिक संदर्भ इन उपसंस्कृतियों का स्वरूप निर्धारित करते हैं। हिन्दी भाषा में आधुनिक समय में पहला एक्शन और फंतासी का गठजोड़, हिन्दी साहित्य के पहले उपन्यासों में से एक, देवकी नंदन खतरी द्वारा रचित ‘चंद्रकांता’ में देखा जा सकता है। तिलिस्म और एक्शन से भरपूर इस उपन्यास में कई ऐसे तत्व थे जिन्होंने इस रचनावली को उस समय में ही नहीं, बल्कि आगे के समय में भी लोगों के लिए रोचक और आकर्षक बनाए रखा।
हिन्दी कॉमिक बुक्स का संसार कभी बहुत समृद्ध या वृहद नहीं रहा, पर एक…