धारावाहिक '24', भारतीय धारावाहिक परंपरा में एक नया प्रयोग

Courtesy:http://www.colorstv.com/in/24/

 

पिछले हफ्ते अनिल कपूर की मुख्य भुमिका वाले धारावाहिक ‘24’ के दूसरे सीज़न के कलर्स चैनल पर समाप्त होने के साथ हिन्दी धारावाहिक परंपरा में एक नया अध्याय जुड़ गया। यह पहली बार हुआ कि कोई ऐसा हिन्दी धारावाहिक अपने दो सीज़न सफलतापूर्वक संपन्न कर पाया जिसके दोनों सीज़न की कड़ियों की संख्या पहले से निर्धारित की गईं थी। दोनों सीज़न में तीन साल का अंतराल था और कहानी जहाँ तीन साल पहले समाप्त हुई थी, तीन साल के अंतराल पर वहीं से शुरु की गई।
हालांकि भारतीय दर्शकों को फिल्मों के स्वीकेल बनने की काफी समय से चली आ रही परंपरा के कारण किसी कहानी के लंबे अंतराल के बाद लौटने का अनुभव हो चुका है (सबसे पहले ऐसे प्रयोग में शामिल थीं श्रीदेवी की मुख्य भुमिकाएँ वालीं निगाहें और नगीना), पर धारावाहिकों की तेज़ी से चलती-बदलती दुनिया में ऐसे प्रयोग कम ही किये गए हैं, और पूर्व-निर्धारित रणनीति के साथ किया गए प्रयास में सिर्फ ‘24’ को ही गिना जा सकता है। अमेरिकी धारावाहिक ‘24’ का यह हिंदी प्रारूप एक दिन के 24 घंटों को को एक-एक घंटे की 24 कड़ियों में दिखाता है जिसमें घटनाएँ निरन्तर घटती रहती हैं बिना किसी सामयिक अंतराल के।
भारत में इससे पहले कई धारावहिकों ने अंतराल के बाद दूसरे सीज़न में उसी कहानी को वहीं से दिखाने की योजना तो बनाई, पर इसमें सफल नहीं हो सके। अब खत्म हो चुके चैनल ‘स्टार वन’ पर दो धारावाहिक- ‘साराभाई वर्सस साराभाई’ और ‘खिचड़ी रीमिक्स’ इसी वादे के साथ खत्म हुए थे कि जल्द ही दूसरे सीज़न के साथ वापस आएँगे, पर ऐसा हो ना सका। इसके बाद कई और धारावाहिकों ने कार्यक्रम के मौजूदा स्वरूप को सीज़न के प्रारुप में तब्दील करने का प्रयास किया पर या तो इनमें कहानियों और पात्रों को बिल्कुल बदल दिया गया या फिर एक सीज़न और दूसरे सीज़न में बहुत कम अंतराल रखा गया, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ कि यह सिर्फ उसी धारावाहिक को एक नए रूप में परोसने की तरकीब थी, या फिर दूसरा सीज़न आने के बाद जल्द ही बन्द कर दिया गया- जैसे कि पारिवारिक धारावाहिक ‘परवरिश’ के साथ हुआ।
यानि ‘24’ से पहले के सीज़न के रूप में धारावाहिक चलाने के प्रयास या तो विफल रहे हैं या फिर पूर्व-निर्धारित सोच के साथ नहीं किए गए हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं पर सबसे अहम पहलू है वाणिज्यिक पहलू। जैसा कि Opinion तंदूर के शुरुआती लेखों में से एक, ‘कहानी धारावाहिकों की’ में तर्क दिया गया था, धारावाहिकों के बीच के अंतराल विज्ञापनों के दिखाए जाने के लिए एक उपयुक्त स्पेस बन कर तैयार हो जाते हैं।
इन्हें सड़क किनारे किसी बिलबोर्ड की तरह समझा जा सकता है। सड़क पर बिलबोर्ड जितनी आकर्षक और सभी को दिख सकने वाली जगह पर स्थित होता है, उतने ही उस पर विज्ञापन दिखाए जाने के दाम होते हैं। उसी प्रकार एक चलते हुए धारावाहिक के बीच के अंतराल भी विज्ञापनकर्ताओं के लिए किसी आकर्षक बिलबोर्ड की तरह होते हैं। ऐसे में जितने दिन तक ये धारावाहिक चलेंगे, उतने ही दिन ये विज्ञापन स्पेस भी बनी रहेगी। ऐसे में धारावाहिकों के हजारों कड़ियों तक चलने की परंपरा का आम होना, धारावाहिकों का साप्ताहिक से दैनिक होना, सप्ताह में चार से पाँच और अब तो छ: या सातों दिनों दिखाया जाना, इसी विज्ञापन स्पेस की निरंतरता को बनाए रखने के प्रभाव हैं।
और तो और अब तो धारावाहिकों की कहानियों में भी अलग-अलग उत्पादों के प्रचार को शामिल कर दिया जाता है। इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’, जिसमें हर बड़ा फिल्मी सितारा अब अपनी फिल्म के प्रचार के लिए इसकी कहानी में शिरकत करता है। ऐसे में धारावाहिक लंबे चलें और निरन्तर चलते रहें, इसमें धारावाहिकों का ही नहीं बल्कि उपभोक्तावादी अर्थ-व्यवस्था का भी बड़ा फायदा है।
पर जहाँ वाणिज्यिक नज़र से यह सौदा फायदे का है, वहीं सृजनशीलता और कलात्मक गुणवत्ता के मद्देनज़र यह काफी नुकसानदेह भी है। लगातार चलने वाले धारावाहिक ना सिर्फ अपने मूल-विषय से भटक जाते हैं, बल्कि समय के साथ कहानी को खींचना भी शुरु कर देते हैं। साथ ही एक खास फॉर्मूले को भुनाने के लिए एक ही विषय पर हर अगला चैनल, धारावाहिकों की झड़ी लगा देते हैं। ऐसे में ना सिर्फ विषयों की विविधता कम होती जाती है, बल्कि सामाजिक और काल्पनिक रूप से इनकी प्रासंगिकता भी समाप्त होती जाती है।
ऐसे में ‘24’ जैसे कार्यक्रमों का सीज़न फॉर्मेट में आना और निर्धारित कड़ियों में चलना इस वाणिज्यिक सिद्धांत के विपरीत जाना है। ऐसे में यदि यह कार्यक्रम दो सीज़न पूरे कर सका है और साथ ही कई विज्ञापन और प्रायोजक जुटा पाया है तो इसमें एक बड़ा योगदान इसके मुख्य नायक अनिल कपूर की लोकप्रियता और इस कार्यक्रम की बेहद रोचक और दिलचस्प कहानी और पेशकश का माना जाएगा।
कहानी और पेशकश की बात भी की जाए तो यह कार्यक्रम बाकि धारावाहिकों से कई मायनों में अलग पाया जाता है। खासकर दूसरे सीज़न में ‘24’ की कहानी और विषयवस्तु में खासा सुधार देखा जा सका। इस वर्ष ना सिर्फ धारावाहिक की कहानी बेहद कसी हुई थी बल्कि पटकथा में भी बहुत कम खामियाँ देखी गईं।
कलाकारों का चयन तो पिछली बार भी अच्छा ही था पर इस बार अच्छे से लिखे गए किरदारों में इन कलाकारों का प्रदर्शन इन्हें और यादगार बनाता है। साथ ही धारावाहिक के निर्माण का स्तर पिछली बार से और भी भव्य था। एरियल शॉट्स, मल्टिपिल कैमरा, कई सारी लोकेशन और हाई-टेक उपकरणों का सही ढंग से प्रस्तुतीकरण, कार्यक्रम के निर्माण में दिए गये ध्यान को इंगित करते हैं। छोटे और बड़े किरदारों की कहानियों पर पूरा ध्यान देना और इन्हें अपने सही निष्कर्ष पर पहुँचाना भी इस सीज़न की खासीयत रहे।
आम तौर पर हिन्दी धारावाहिकों को उनकी विषयवस्तु के चयन की कसौटी पर नहीं मापा जाता है। पर ‘24’ में कुछ ऐसे विषय देखे गए जो बाकी धारावाहिकों में नहीं उठाए जाते हैं। महिला ऑफिसकर्मियों का पुरुष ऑफिसकर्मियों के मुकाबले कम आंका जाना, घरेलू हिंसा, सर्वेक्षण प्रणालियों का गलत लोगों के हाथों में पड़ना और इससे होने वाले संभव खतरे, जैविक आंतकवाद के भय, राजनैतिक उठापटक, सत्ता के लालच में निजी और वैयक्तिक संवेदनाओं और सिद्धांतों का त्याग और साथ ही आंतकवाद का किसी पूर्वाग्रह रहित मुल्यांकन कर इसे लालच और विशुद्ध मुनाफे के ध्येय से जोड़ कर देखना, ये सभी विषयवस्तु इस सीज़न को हिन्दी धारावाहिक परिदृश्य में अलग खड़ा करते हैं।साथ ही पात्र परियोजना के मद्देनज़र ताकतवर महिला किरदारों की भारी तादाद और डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चे के किरदार को कार्यक्रम में शामिल करना, साहसी और प्रशंसनीय कदम हैं।
ये सभी बातें दिखाती हैं कि कैसे ‘24’ के सीज़न प्रारूप ने इस धारावाहिक को बाकी धारावाहिकों से अलग बनाया और साथ ही इसकी गुणवत्ता को भी कई गुना बढ़ाया। कहानी को एक अंतराल के बाद दिखाने से इसके लेखकों, निर्देशन समूह और निर्माताओं को इस कार्यक्रम को और निखारने का मौका मिला जो निरंतर चलने वाले धारावाहिकों को नहीं मिलता है। हिन्दी धारावाहिक परिदृश्य में यह एक प्रयोग ही कहा जा सकता है।
आने वाले समय में आम दर्शकों में इस कार्यक्रम की लोकप्रियता ना सिर्फ इस कार्यक्रम के भाग्य का फैसला करेगी बल्कि इस बात का भी निर्णय करेगी कि क्या पूर्व-निर्धारित कड़ियों के सीज़नल फॉर्मेट पर आधारित धारावाहिक भारत में सफल हो सकते हैं और क्या विज्ञापन स्पेस की निरंतरता के उपभोक्तावादी सिद्धांत के उलट जाकर यह फॉर्मेट धारावहिकों को काल्पनिकता और प्रासंगिकता के क्षेत्र में बेहतर होने का मौका प्रदान कर सकता है।
-सुमित

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